दादा भगवान प्ररूपित
आत्मबोध
मूल गुजराती संकलन : डॉ. नीरू बहन अमीन
अनुवाद : महात्मागण
संपादकीयआत्म साक्षात्कार पाने के लिए, आत्मा को जानने के लिए तमाम धर्मों में बताया गया है। लेकिन आत्मा कैसे प्राप्त करें? आत्मा का सच्चा स्वरूप क्या है? आत्मा क्या करता है? इन सब प्रश्रों का समाधान कैसे करें? यह ज्ञान कहाँ से प्राप्त हो सकता है? विश्व में कभी कभार आत्मज्ञानी पुरुष अवतरित होते हैं, तभी यह आध्यात्मिक रहस्य खुला हो पाता है। संसार में जो भी ज्ञान है वह भौतिक ज्ञान है, रिलेटिव ज्ञान है। उससे आत्म साक्षात्कार कभी नहीं हो सकता। ज्ञानी पुरुष को आत्मा का अनुभव होनेसे आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति हो सकती है। आत्मा पर तो गीता में, उपनिषद में, वेद में, आगम में बड़े-बड़े ग्रंथ संकलित हो जाएँ इतना कुछ कहा गया है। मगर जब खुद ज्ञानी पुरुष प्रत्यक्ष रहते हैं, तब मूल तत्त्वों की बात का संक्षिप्त में सारा ज्ञानार्क प्राप्त हो जाता है। आत्मा क्या चीज़ है? कषाय और आत्मा का क्या संबंध है? कषाय आत्मा का गुण है या जड़ का? आत्मा निर्गुण है या सगुण? वह द्वैत है या अद्वैत? ब्रह्म सत्य है या जगत्? क्या आत्मा सर्वव्यापी है? जड़ और चेतन की भेदरेखा, आत्म शक्ति और प्राकृत शक्ति में क्या अंतर है? आत्मा सक्रिय है या अक्रिय? असल में आत्मा क्या चीज़ है? आत्मा का स्थान कहाँ? वह कैसे दिखाई दे? जड़ तत्त्व और चेतन तत्त्व के मिश्रण से जो विशेष परिणाम ‘साइन्टिफिकली’ उत्पन्न हुआ है, जो सारे संसार परिभ्रमण की जड़ है, उसका यथार्थ विज्ञान परम पूज्य दादाश्री ने यहाँ सुस्पष्ट किया है! विश्व के छ: सनातन तत्त्वों का भी सुंदर, सरल भाषा में वर्णन किया है। इन सारी बातों को ज्ञानी के अलावा और कौन बता सकता है? परम पूज्य दादा भगवान, जो इस काल में पूर्ण ज्ञानी हो गए, उन्होंने ये सारी बातें सीधी, सरल और सहज भाषा में समझाई हैं। सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी समझ जाए ऐसी भाषा में, उदाहरणों के साथ बताने से, गुह्य बात भी समझने में बहुत सरल हो गई है। शास्त्रों की बात समझ में जल्दी आती नहीं। आत्मा को पहचानने का दादाश्री का सुंदर भेदज्ञान का प्रयोग है, जिसके जरिये सिर्फ दो ही घंटे में ज्ञान प्राप्त हो जाता है! जिससे बाकी रहे शेष जीवन में आमूल परिवर्तन आता है और हमेशा ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’ ऐसा ख्याल में रहता है।- डॉ. नीरु बहन अमीन के जय सच्चिदानंद (पृ.१)आत्मबोधआत्मा - निर्गुण या सगुण?प्रश्नकर्ता : भगवान को निर्गुण, निराकार बोलते हैं, वह सही बात है? दादाश्री : भगवान निराकार हैं, लेकिन निर्गुण नहीं हैं। निर्गुण तो यहाँ पर एक पत्थर भी नहीं है। भगवान में प्राकृतिक एक भी गुण नहीं है पर खुद स्वाभाविक गुण का धाम हैं। प्रकृति के गुण हैं, वे सब नाशवंत हैं। उन नाशवंत गुणों (की दृष्टि) से आत्मा निर्गुण है और स्वाभाविक गुणों से, परमानेन्ट गुणों से वो भरपूर है। वो सब गुण हमने देखे हैं। उन सभी गुणों को हम जानते हैं। जैसे सोने का (अपना) गुण है और तांबे का भी (अपना) गुण है, दोनों अपने स्वाभाविक गुणों से अलग रहते हैं। गुण के बिना तो वस्तु की कैसे पहचान हो सकती है? वस्तु का अपना गुण रहता है। प्रकृति के सब गुण विनाशी हैं। कोई बड़े संत पुरुष हों, पर वे ‘ज्ञानी’ नहीं हुए और उन्हें आत्मा का अनुभव नहीं हुआ हो तो वे प्राकृत गुण में ही हैं। उनको कितनी भी गाली दो, मार मारो तो भी समता रखते हैं, तो आपको लगेगा कि ये कितनी समता, शांति, क्षमा, सत्य, त्याग, बैराग गुण वाले हैं, लेकिन उनको कभी सन्निपात होता (दिमाग़ घूमता) है, तो वो बड़े संत पुरुष भी गाली देंगे, मार मारेंगे। वो प्रकृति का गुण है और वो सब गुण नाशवंत हैं। प्रकृति का अच्छा गुण हो, तो भी उसमें खुश होने की ज़रूरत नहीं है। जिसे आत्मा का अनुभव हो गया फिर उसे कुछ नहीं होता है। (पृ.२)प्रकृति का एक भी गुण शुद्धात्मा में नहीं है और शुद्धात्मा का एक भी गुण प्रकृति में नहीं है। मनुष्य को जो इच्छा होती है, वो प्राकृत गुण है, उसमें आत्मा तन्मयाकार हो जाता है, तो उससे कर्म बंधते हैं। आत्मा तन्मयाकार नहीं होता, तो दोनों अलग ही हैं। अज्ञानता से तन्मयाकार हो जाता है और ज्ञान मिले तो फिर तन्मयाकार नहीं होता है। आत्मा, द्वैत या अद्वैत?प्रश्नकर्ता : आत्मा द्वैत है या अद्वैत है? दादाश्री : कई लोग बोलते हैं कि आत्मा द्वैत है, तो कई लोग बोलते हैं कि विशिष्टाद्वैत है, अद्वैत है, शुद्धाद्वैत है, ऐसा तरह-तरह का कहते हैं। लेकिन आत्मा द्वैत नहीं है, अद्वैत भी नहीं है। आत्मा द्वैताद्वैत है। ‘ज्ञानी पुरुष’ द्वैत भी हैं और अद्वैत भी हैं, दोनों साथ में रहते हैं। अद्वैत में ज्ञाता-द्रष्टा और परमानंदी है और द्वैत में क्रिया करता है। द्वैत क्रिया करता है, उसका अद्वैत ज्ञाता-द्रष्टा रहता है। द्वैत ज्ञेय है और भगवान ज्ञाता-द्रष्टा, परमानंदी है। जहाँ तक देह है, वहाँ तक आत्मा अकेला अद्वैत नहीं हो सकता। द्वैताद्वैत रहता है। बाइ रिलेटिव व्यू पोइन्ट आत्मा द्वैत है। बाइ रियल व्यू पोइन्ट आत्मा अद्वैत है। इसलिए आत्मा को द्वैताद्वैत कहा है। पहले खुद की पहचान चाहिए कि ‘मैं स्वयं कौन हूँ’। क्या नाम है आपका? प्रश्नकर्ता : रवीन्द्र। दादाश्री : तो आप खुद रवीन्द्र हैं? वो तो आपका नाम है। जब तक भ्रांति है, तब तक खुद की शक्ति प्रकट नहीं होती। ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ वो तो भ्रांति है और ‘मैं कौन हूँ’ जान लिया कि सब भ्रांति चली गई। प्रश्नकर्ता : पंचभूत माया के अधीन ही है? दादाश्री : माया किसकी लड़की है? (पृ.३)प्रश्नकर्ता : भगवान की है। दादाश्री : भगवान की लड़की?! देखिए, मैं आपको सच बता दूँ कि माया क्या है! स्वरूप की अज्ञानता, वो ही माया है। जहाँ तक स्वरूप की अज्ञानता है, वहाँ तक माया है। स्वरूप का ज्ञान हो गया कि माया चली जाती है। प्रश्नकर्ता : माया कोई वस्तु है? उसका कुछ अस्तित्त्व है? दादाश्री : कोई अस्तित्त्व ही नहीं है। वो रिलेटिव है, वो रियल नहीं है। वेदांत में क्या लिखा है, भगवान प्राप्त करने के लिए क्या चाहिए? मल, विक्षेप और अज्ञान जाने चाहिए, तो भगवान मिलते हैं। तो अज्ञान, वो ही माया है। प्रश्नकर्ता : तो अज्ञान कैसे जाता है? दादाश्री : वो ‘ज्ञानी पुरुष’ मिलते हैं, तो उनकी कृपा से सब चला जाता है। जो मुक्त हो गए, वो सबकुछ कर देते हैं। दुनिया में आए हैं तो कुछ समझना तो चाहिए न! ये दुनिया किसने बनाई? क्यों बनाई? प्रश्नकर्ता : वैसे तो कहा है कि, ‘एकोहम् बहुस्यामि’, तो इसके बनाने का कहीं अर्थ ही नहीं निकलता है। दादाश्री : वो आत्मा है न, वो ही भगवान है और वो ही ‘एकोहम् बहुस्यामि’ है। भगवान तो सभी जगह पर एक ही समान है। भगवान में फर्क नहीं है, डिफरन्स नहीं है। ‘एकोहम् बहुस्यामि’ वो तो ऐसा बोलते हैं कि भगवान एक ही है और बहुस्यामि यानी अलग-अलग आत्मा के रूप में है। सब आत्मा मिलाएँ तो एक ही होता है, एक लाइट में सभी लाइट मिल जाती है, ऐसा बोलते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। क्योंकि इसमें अपने को क्या फायदा? सत्य क्या? ब्रह्म या जगत्?प्रश्नकर्ता : जगत् नहीं है? (पृ.४)दादाश्री : जगत् है, नींद में भी है और जागृत में भी है। प्रश्नकर्ता : लेकिन ब्रह्म को सत्य और जगत् को मिथ्या कहते हैं न? दादाश्री : जगत् मिथ्या नहीं है। जगत् सत्य है। मिथ्या बोलते हैं, वो दूसरी भाषा में बोलते हैं। वो भाषा आपको समझ में नहीं आती है। वो बोलते हैं वो गलत नहीं बोलते हैं, लेकिन अपनी समझ में आना चाहिए कि किसे मिथ्या बोलते हैं! जगत् सत्य है और ब्रह्म भी सत्य है। द वल्र्ड इज़ रिलेटिव करेक्ट ऐन्ड ब्रह्म इज़ रियल करेक्ट। कोई रस्ते पर पैसे फेंक देता है? कभी भी कहीं किसी रास्ते पर एक पैसा भी मिलता है? कितने पैसे गिरते हैं, लेकिन पूरे रास्ते पर एक पैसा भी नहीं मिलता है। अरे, 24 घंटे पैसे फेंको तो भी सब लोग तुरंत उठा लेते हैं। जगत् मिथ्या तो नहीं है। जगत् मिथ्या रहता तो नींद में मुँह में मिर्ची डाल देने पर कोई उठेगा ही नहीं। लेकिन मिरची डाल दिया तो फिर उसे उठाना नहीं पड़ता है। उसको इफेक्ट हो जाती है। ऐसे जगत् भी सत्य है। कभी किसी ने गाली दे दिया, तो जगत् मिथ्या लगता है? जगत् रिलेटिव सत्य है, आत्मा रियल सत्य है। प्रश्नकर्ता : सुषुप्त में और स्वप्न में जगत् नहीं है, ये जागृत अवस्था में जगत् आता है? दादाश्री : नहीं, स्वप्न में जो जगत् है, वह दो शरीर का जगत् है। वह जो स्वप्न है, वह दो शरीर का स्वप्न होता है, वह बंद आँख का स्वप्न है। ये खुली आँख का स्वप्न है, यह तीन शरीर का स्वप्न है। इसमें जागृत हो गया, फिर मुक्त हो गया। जहाँ तक स्वप्न है, वहाँ तक जगत् सत्य लगता है। स्वप्न खुल गया तो सत्य नहीं लगता। मालिकी भाव, वहाँ चेतन!प्रश्नकर्ता : भगवान सर्वव्यापी हैं लेकिन वे दिखाई क्यों नहीं देते? (पृ.५)दादाश्री : सर्वव्यापी माने क्या? प्रश्नकर्ता : ऑम्निप्रेज़न्ट (सर्वव्यापी), हर चीज़ में भगवान हैं। दादाश्री : तो ये टेपरिकॉर्डर तोड़ डाले तो हिंसा होती है न? प्रश्नकर्ता : हाँ। दादाश्री : और चिड़िया को मार डाले तो भी हिंसा होती है? प्रश्नकर्ता : हाँ, होती है। दादाश्री : चिड़िया की हिंसा और टेपरिकॉर्डर की हिंसा समान है? प्रश्नकर्ता : इसमें प्राणी की हत्या होती है, और उसमें दिखाई नहीं देती। दादाश्री : हाँ, तो ये जड़ है और चिड़िया में चेतन है। जहाँ चेतन है, वहाँ नुकसान करें तो हिंसा होती है और जड़ को नुकसान करें तो हिंसा नहीं होती। लेकिन इसमें क्या होता है, वो जानने की ज़रूरत है। यदि टेपरिकॉर्डर का कोई मालिक नहीं हो, तो हम टेपरिकॉर्डर को तोड़़ डालें, तो हम को हिंसा नहीं लगती। लेकिन उसका कोई मालिक हो तो टेपरिकॉर्डर तोड़ डालने से उसके मालिक को दु:ख होता है, इस तरह हिंसा होती है। इसलिए सब में भगवान हैं, ऐसा बोला है। यदि जड़ की किसी की मालिकी नहीं हो, तो इसके अंदर भगवान नहीं हैं, लेकिन कोई मालिक है, तो मालिक को दु:ख होता है, इसलिए इतना ही चेतन जड़ में है ऐसा बोला है। उसको ‘संकल्प चेतन’ बोलते हैं। नहीं तो जड़ तो जड़ ही है, उसमें भगवान रहते ही नहीं। प्रश्नकर्ता : लेकिन भगवान सर्वव्यापी तो निश्चित रूप से हैं या उसमें भी कोई शंका है? (पृ.६)दादाश्री : सर्वव्यापी का अर्थ यह है कि भगवान का जो प्रकाश है, वो प्रकाश सर्वव्यापी हो जाता है। यदि देह का आवरण इनको नहीं हो तो इनका प्रकाश कैसा है? सर्वव्याप्त है। सच्चा भगवान जड़ में नहीं है, सब क्रीचर के अंदर है और शुद्ध चेतन रूप में है। सारा ब्रह्मांड क्रीचर से भरा हुआ है। सब के अंदर भगवान हैं। गॉड इज़ इन एवरी क्रीचर, व्हेदर विज़िबल आर इनविज़िबल; ऐन्ड नॉट इन क्रिएशन! ये भगवान का सच्चा एड्रेस है। वो सच्चा एड्रेस जानने में क्या फायदा है कि ये टेबल को आप तोड़ देंगे तो इसका कोई पाप नहीं लगता है। इसके मालिक को पूछकर मैं तोड़ देता हूँ, तो कोई पाप नहीं लगता है। एक बग (खटमल) मार दिया तो पाप होता है, क्योंकि उसके अंदर भगवान हैं। जहाँ भगवान हैं, वहाँ हिंसा मत करो और इसकी, टेबल की हिंसा हो जाए, तोड़ डालो तो भी कोई हर्ज नहीं और नया बना दो तो भी कोई हर्ज नहीं। जो आदमी बना नहीं सकता, एक बग को आदमी बना नहीं सकता है, उस क्रीचर के अंदर भगवान हैं। प्रश्नकर्ता : जितने क्रीचर हैं, उन सब के अंदर शुद्ध चेतन है? दादाश्री : सब में ही शुद्ध चेतन है। प्रश्नकर्ता : तो फिर जड़ में भी शुद्ध चेतन होना चाहिए। दादाश्री : जड़ में शुद्ध चेतन नहीं है। जड़ तो जड़ ही है। जड़ तो निकाल (निपटारा) कर देने की चीज़ है, ग्रहण करने की चीज़ नहीं है। इसके अंदर संकल्प चेतन है। मैं उसका मालिकभाव छोड़ दूँ तो उसमें से इतना चेतन निकल जाता है। जड़ पदार्थ के अंदर संकल्प चेतन है और जो सच्चा भगवान है वो शुद्ध चेतन रूप है। जहाँ ज्ञान नहीं है, इमोशन्स नहीं हैं, वहाँ चेतन नहीं है। चेतन का अर्थ ही ज्ञान है। अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान, वो ही चेतन है। तो जहाँ ज्ञान है वहाँ चेतन है। नहीं तो जहाँ ज्ञान नहीं हो, लेकिन (पृ.७)वहाँ किसी का मालिकी भाव हो तो उसको ‘संकल्प चेतन’ बोला जाता है। संकल्प चेतन सच्चा चेतन नहीं है। मालिकीभाव छोड़ दें तो कुछ भी नहीं। सर्वव्यापी, चैतन्य या चैतन्यप्रकाश?प्रश्नकर्ता : चैतन्य सर्वव्यापी है, वह कैसे कहा गया है? दादाश्री : वो सर्वव्यापी ही है। सर्वव्यापी कैसे है, वो आपको बताऊँ, सिमिली (उदाहरण) बताऊँ? इस रूम में लाइट करें तो लाइट कितनी व्याप्त होती है? ये रूम जितना हो, उतनी ही व्याप्त होती है। इसी लाइट को एक मटके के अंदर रख दिया तो मटके में उतनी ही लाइट व्याप्त रहती है। मटका तोड़ दो, तो पूरे रूम में लाइट फैल जाती है। ऐसा आत्मा, अंतिम जन्म में जब यह देह छूट जाती है न, तो सारे ब्रह्मांड में प्रकाश हो जाता है। आत्मा सिर्फ प्रकाश रूप है। ये सब आप जो देखते हैं, वो सब टेम्परेरी हैं। चेतन कोई जगह पर आपने देखा है? प्रश्नकर्ता : कहीं नहीं दिखाई पड़ता। दादाश्री : तो क्या देखते हो? जड़ देखते हो? प्रश्नकर्ता : स्थूल रूप में सारे दृश्य दिखाई पड़ते हैं। दादाश्री : हाँ, स्थूल जो दिखता है वो जड़ है, लेकिन जो नहीं दिखता ऐसा सूक्ष्म भी जड़ है। ये सब चाबी दिया हुआ जड़ है, चेतन ऐसा नहीं है। प्रश्नकर्ता : चैतन्य है, वह अणु है और विराट भी है और वह सभी जगह में व्याप्त है। दादाश्री : ऐसा नहीं है। चैतन्य का स्वभाव व्याप्त है लेकिन स्वाभाविक चैतन्य इधर दुनिया में रहता ही नहीं। जो चैतन्य दुनिया (पृ.८)में है वो विशेषभावी है, स्वभावभावी नहीं है। जो स्वभावभावी चैतन्य हो तो उसकी लाइट सारी दुनिया में व्याप्त हो जाती है!!! प्रश्नकर्ता : चैतन्य सब जगह व्याप्त है न? दादाश्री : हाँ, व्याप्त कभी होता है? कोई दफ़ा हज़ारों-लाखों में एक होता है, नहीं तो व्याप्त नहीं होता। कोई इधर से भगवान स्वरूप हो गया और वह मोक्ष में जाता है, उस वक्तउसकी लाइट सब जगह व्याप्त हो जाती है। ये हरेक को नहीं होता। सब के लिए तो आत्मा आवरणमय ही है। हम ‘ज्ञानी पुरुष’ हैं, फिर भी सर्वव्याप्त नहीं हैं। हम हरेक चीज़ देख सकते हैं। हमारे को पुस्तक की ज़रूरत नहीं हैं। हम ‘देखकर’ बोलते हैं। प्रश्नकर्ता : आत्मदृष्टि हो जाए तो ये सब बाहर के आवरण नहीं रहते? दादाश्री : इन सब को (आत्मज्ञान पाए महात्माओं को) आत्मा का स्वरूप बताया है। इनको हमने दिव्यचक्षु दिए हैं। ये सब आपका आत्मा देख सकते हैं। पेड़ का आत्मा भी देख सकते हैं। ये दुनिया का ग्यारहवाँ आश्चर्य है!!! ऐसा कभी हुआ नहीं। ये बिल्कुल नई बात है। वैसे बात तो पहले की है, जो त्रिकाल सत्य है। वो त्रिकाल सत्य एक ही बात रहती है। ये दुनिया जैसी दिखती है न, ऐसी नहीं है। जैसी सब लोगों ने जानी है, ऐसी भी नहीं है। जड़ व चेतन : स्वभाव से ही भिन्न!इस दुनिया में छ: तत्त्व हैं। वो छ: तत्त्व अविनाशी हैं। इसमें एक शुद्ध चेतन तत्त्व है, वो आत्मविभाग है। दूसरे पाँच तत्त्व हैं, जो अनात्म विभाग के हैं। उन सब में चेतन नहीं है, वो आत्मविभाग नहीं हैं। प्रश्नकर्ता : मैंने ऐसा पढ़ा है कि जड़ में भी भगवान है, इसलिए जड़-चेतन में कोई फर्क नहीं है, सब में ही भगवान है। (पृ.९)दादाश्री : जड़ और चेतन के बीच डिफरन्स है। जो चेतन है न, उसमें जानने की शक्ति, देखने की शक्ति और परमानंद शक्ति है और जिसमें जानने-देखने की शक्ति नहीं, परमानंद शक्ति नहीं है, वो सब जड़ है। जड़ में चेतन जैसी शक्ति नहीं है। प्रश्नकर्ता : तो फिर जड़ से चेतन पैदा नहीं हो सकता है? दादाश्री : नहीं, नहीं। जड़ में से चेतन कभी हो सकने वाला ही नहीं और चेतन में से जड़ भी होने वाला नहीं। चेतन में कोई संयोग पदार्थ ही नहीं है। चेतन कोई कम्पाउन्ड स्वरूप नहीं है। वो स्वतंत्र है। जड़ भी स्वतंत्र है और चेतन भी स्वतंत्र है। और दोनों संयोग स्वरूप हैं, कम्पाउन्ड स्वरूप नहीं हैं। प्रश्नकर्ता : लेकिन जड़ और चेतन एक ही हैं न? दादाश्री : नहीं, नहीं। दोनों अलग हैं। जड़ और चेतन एक हैं, वह बात गलत है। ये सब रिलेटिव करेक्ट है, लेकिन रियल करेक्ट नहीं है। रियल इज़ रियल ऐन्ड रिलेटिव इज़ रिलेटिव! प्रश्नकर्ता : वॉट इज़ रिलेटिव करेक्ट? दादाश्री : जिसको अवलंबन लेना पड़ता है, वो सब रिलेटिव करेक्ट है। जो निरालंब है, स्वतंत्र है, इन्डिपेन्डेन्ट है, वो रियल करेक्ट है। जिसको कोई चीज़ की ज़रूरत नहीं, वो ही रियल है और जो संबंध वाला है, वो सब रिलेटिव है। प्रश्नकर्ता : एक बीज है, उसको खेत में बोते हैं, वो उगता है, वह चेतन उगता है और वह सब जड़ के आधार से उगता है? पृथ्वी, पानी, सब संयोगों से? दादाश्री : नहीं, चेतन नहीं उगता, जड़ उगता है। जो उगता है, वो भी जड़ है, लेकिन अंदर चेतन है। वो चेतन के प्रभाव से, चेतन की हाज़िरी से जड़ उगता है। चेतन की हाज़िरी चली जाए तो फिर वो नहीं उगता। ये धान आता है न? जो शालि बोलते हैं, वो शालि (पृ.१०)भी चार-पाँच साल की हो तो वहाँ तक पानी डालेगा तो उगेगी, फिर आठ-दस साल हो गया तो नहीं उगेगी। आत्मशक्ति और प्राकृत शक्ति!प्रश्नकर्ता : आत्मा और आत्मा की शक्ति, ब्रह्म और ब्रह्म की शक्ति में क्या फर्क है? दादाश्री : वो दोनों एक ही हैं, आत्मा और ब्रह्म दोनों एक ही हैं। कुछ खास फर्क नहीं है। प्रश्नकर्ता : और देवी-देवताओं को हम मानते हैं, तो उसमें शक्ति है वो अलग है? दादाश्री : हाँ, माताजी की शक्ति अलग है। आत्मा अलग है, माताजी अलग हैं। माताजी की शक्ति है, वो प्राकृत शक्ति है और वह प्रकृति को नॉर्मल रखने के लिए है। आँख से दिखाई देता है वो जो शक्ति है, वो आत्मशक्ति नहीं है। वो अनात्म विभाग है, उसकी शक्ति है। अनात्म विभाग है, वो भी शक्ति वाला है। आत्मा में भी शक्ति है, वो अनंत शक्ति है। प्रश्नकर्ता : आत्मा को ये शक्ति रहित कर दिया तो आत्मा जड़ हो जाएगा कि चेतन ही रहेगा? दादाश्री : नहीं, आत्मा तो खुद चेतन ही रहता है। वो कभी बाहर से शक्ति नहीं लेता और उसकी शक्ति दूसरे को नहीं देता। वो चेतन ही रहता है, शुद्ध ही रहता है। वो शुद्ध है और वो ही परमात्मा है। परमात्मा की शक्ति में कोई चेन्ज नहीं होता। लेकिन इन सब लोगों को भ्रांति है, इसलिए ‘ये मैं हूँ, ये हमने किया’ ऐसा बोलते हैं और सब भ्रांति में चल रहे हैं। मनुष्य कुछ भी करता है, वो सब जड़ की शक्ति है, इसमें चेतन की कोई शक्ति नहीं है। ये तो इगोइज़म (अहम्भाव) करता है ‘ये मैंने किया’, वो ही भ्रांति है। सारी दुनिया जड़ को ही चेतन मानती है, लेकिन चेतन तो चेतन ही है। उस चेतन को अकेले ‘ज्ञानी पुरुष’ ही जानते हैं। (पृ.११)प्रश्नकर्ता : जो आत्म तत्त्व है, वो सभी को प्रकाशित करता है न? जड़ को भी और चेतन को भी? दादाश्री : हाँ, वो सब को प्रकाशित करता है, लेकिन जड़ कभी चेतन नहीं होता है। क्या चेतन सर्वत्र है?भगवान को कभी आपने देखा है? भगवान किधर है? प्रश्नकर्ता : भगवान तो सब जगह पर है, ऑम्निप्रेज़न्ट, सर्वत्र है। दादाश्री : सब जगह पर भगवान है तो यहाँ आने की कोई ज़रूरत ही नहीं। मंदिर में भी जाने की ज़रूरत नहीं। मंदिर में कभी जाते हो? प्रश्नकर्ता : हाँ, जाता हूँ। दादाश्री : भगवान घर में भी है, फिर मंदिर में क्यों जाते हो? प्रश्नकर्ता : वहाँ पर भावना से जाता हूँ। दादाश्री : बात तो समझनी चाहिए न? सब जगह भगवान है, तो दूसरा कोई है ही नहीं?! वो चावल आपने देखे हैं? वो खाने के लिए होता है, इसमें अंदर से कभी-कभी बारीक पत्थर निकलता है। उसको फिर चुनते हैं न?! ये चावल की बोरी है, उसमें सिर्फ चावल ही हो, तो फिर इसको चुनने का नहीं है, ऐसी बात है। बोलने के लिए, ‘ये सब चावल है’ ऐसा बोलते हैं, लेकिन ये चावल भी है और पत्थर भी हैं। इसी तरह ‘सभी जगह आत्मा है’ वो बात ऐसी है कि आत्मा भी है और अनात्मा भी है। नहीं तो सभी जगह आत्मा है तो फिर दूसरी जगह जाने की ज़रूरत नहीं है। परमात्मा सभी जगह पर है तो फिर परेशानी हमें क्यों रहती है?! जिसने ऐसा बताया कि सभी जगह परमात्मा है, वो रोंग थ्योरी है। यदि सभी जगह परमात्मा है, तो किसी को डिप्रेशन कभी होगा ही नहीं, परमानंद ही रहना चाहिए। लेकिन ऐसा है नहीं। कृष्ण भगवान ने कहा है कि दुनिया में आत्मा और अनात्मा, दो चीज़ हैं। जड़ और चेतन हैं। चेतन भगवान है और जड़ दूसरी चीज़ है। तो सभी जगह पर आत्मा नहीं है। आत्मा भी है और जड़ भी है। (पृ.१२)गॉड इज़ इन एवरी क्रीचर व्हेदर विज़िबल आर इनविज़िबल, बट नॉट इन क्रिएशन। आपके और मेरे बीच में इनविज़िबल क्रीचर बहुत हैं, उन सभी में भगवान है। प्रश्नकर्ता : इनविज़िबल क्रीचर के अंदर भगवान है, इसका प्रूफ कैसे दे सकते हो? दादाश्री : इनविज़िबल क्रीचर (अगोचर जीव) वो सब एक्टिव हैं और उनको दु:ख अप्रिय है और सुख प्रिय है। ये जो टेपरिकॉर्डर है, वो एक्टिव नहीं है। प्रश्नकर्ता : इनविज़िबल क्रीचर को भी सुख-दु:ख रहता है? दादाश्री : सुख-दु:ख तो सब को होता है, पेड़ को भी सुख-दु:ख होता है। क्रीचर मात्र को सुख-दु:ख की इफेक्ट होती है। पेड़ को भी बहुत ज़ोर से हवा आए, तूफान बोलते हैं न, तो भी दु:ख होता है। अशोक वृक्ष को कोई ‘लेडी’ हाथ लगाए तो उसको खुशी हो जाती है। ये आँख से दिखते हैं, वो जंतु हैं, उसको भी अपना हाथ लगे तो त्रास लगता है, तो वो भाग जाता है। सक्रियता में शुद्ध चेतन कहाँ?अभी चलता-फिरता दिख रहा है वो ही आत्मा है न? प्रश्नकर्ता : वो तो शरीर दिखाई देता है। शरीर के भीतर चेतन है। शरीर चेतन नहीं है। दादाश्री : लेकिन ये शरीर सब क्रिया करता है, वो कौन करता है? प्रश्नकर्ता : भीतर में चेतन है, वो करवाता है। दादाश्री : वो आत्मा ऐसा हाथ ऊँचा करता है? नहीं, वो तो मिकेनिकल चेतन है। आत्मा ऐसा नहीं करवाता, वो खाली प्रकाश ही देता है। उसकी हाज़िरी से ही सबकुछ हो रहा (पृ.१३)है। उसकी हाज़िरी चली जाए तो ये मिकेनिकल सब बंद हो जाएगा। खाता है, पीता है, शौच जाता है, वो सब मिकेनिकल आत्मा है। लेकिन ‘हम खाते हैं, हम पीते हैं, हम शौच जाते हैं’ ऐसी प्रतिष्ठा करता है। प्रतिष्ठा की तो ‘प्रतिष्ठित आत्मा’ उत्पन्न हो गया। वो सच्चा आत्मा नहीं है, वो ‘मिकेनिकल आत्मा’ है। आप जो ज़िंदा आदमी को देखते हो, जिस भाग को ज़िंदा कहते हो, वो ज़िंदा नहीं है। लेकिन बुद्धि से वो ज़िंदा लगता है और ज्ञान से वो ज़िंदा नहीं है। ज्ञान से वो मात्र मिकेनिकल चेतन है। ‘निश्चेतन चेतन का खेला, सापेक्षित संसार है’ - कविराज नवनीत ये संसार कैसा है? ये आँख से दिखता है, वो सब मिकेनिकल चेतन है। ये जज दिखता है, आरोपी दिखता है, वकील भी दिखता है, डॉक्टर भी दिखता है, सब लोग जो क्रिया करते हैं, वो सब मिकेनिकल है। उसमें भगवान नहीं है, ये सब निश्चेतन चेतन हैं। यानी हैन्डल मारने (प्रयत्न करने) से चलता है। वो सच्चा चेतन नहीं है। सच्चा चेतन अचल है और ये चंचल हैं। सच्चा चेतन स्थिर है, हिमालय जैसा स्थिर है। कितनी भी हवा चले तो हिमालय नहीं हिलता, ऐसे ही सच्चा चेतन स्थिर है। पूरे दिन में शरीर कितनी भी क्रिया करे, कितना भी हिलता है, लेकिन वो शुद्ध चेतन अचल है, स्थिर है। ‘विनाशी चीज़ पूरण-गलन है, अविनाशी भगवान हैं’ -कविराज नवनीत कविराज क्या कहते हैं कि विनाशी चीज़ सब पूरण (चार्ज होना, भरना) है और गलन (डिस्चार्ज होना, खाली होना) है, आने-जाने वाली चीज़ है। इधर से खाना खाया फिर शौच में गलन होता है। पानी पूरण किया, फिर बाथरूम (पेशाब) में गलन होता है। श्वास का पूरण किया, फिर उच्छ्वास में गलन होता है। वो सब पूरण-गलन है, वो सब विनाशी है और भगवान खुद इसमें अविनाशी है। (पृ.१४)आत्मा का रियल स्वरूप!प्रश्नकर्ता : ‘अज्ञानी आत्मा’ किसे कहते हैं और ‘ज्ञानी आत्मा’ किसे कहते हैं? दादाश्री : जहाँ ‘मैं नहीं हूँ’, वहाँ ‘मैं हूँ’ बोलते हैं, वो ‘अज्ञानी’ है। ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ बोलता है, वह ‘अज्ञानी’ है। ‘मैं इस स्त्री का पति हूँ, इस लड़के का फादर हूँ, इसका भाई हूँ’ वह सब ‘अज्ञान’ है। सेल्फ को रियलाइज़ कर लिया और ज्ञान हो गया कि, ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’, तो वो ज्ञानी है। ‘शुद्धात्मा’ भी फस्र्ट स्टेज का ज्ञान है, इससे उसको मोक्ष में जाने का ‘वीज़ा’ मिल गया। लेकिन यहाँ तक आ गया तो बहुत है। ‘वीज़ा’ मिल जाने के बाद प्लेन मिल जाएगा, सब मिल जाएगा, मोक्ष पक्का हो जाएगा। प्रश्नकर्ता : पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और अंदर सूक्ष्म भावेन्द्रिय होती है, तो भावेन्द्रिय क्या है? दादाश्री : भावेन्द्रिय, वह भाव है। भावेन्द्रिय पर चलता है, वो ही ‘अज्ञानी आत्मा’ है। ‘मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैंने किया’, वो ‘अज्ञानी आत्मा’ है और हम आपको ज्ञान देते हैं, बाद में आप बोल सकते हैं कि, ‘रवीन्द्र देखता है, रवीन्द्र सुनता है, रवीन्द्र ने ये किया।’ फिर आप ये सब को अलग भी देख सकते हैं। प्रश्नकर्ता : हम तो ये समझते हैं कि जिसका आत्मा सच्चा है, वो सब से बड़ा शक्तिमान है और जिसका आत्मा तुच्छ है तो... दादाश्री : आत्मा तुच्छ होता ही नहीं। प्रश्नकर्ता : विचार तुच्छ हो जाते हैं, तो आत्मा तुच्छ हो जाता है। दादाश्री : नहीं, आत्मा तुच्छ कभी नहीं होता, कभी हुआ भी नहीं। ये पेड़ को कहाँ विचार आता है? प्रश्नकर्ता : वो तो जड़ है। (पृ.१५)दादाश्री : नहीं, वो जड़ नहीं है। पेड़ को ज्ञान है, ज्ञान के बिना कोई ज़िंदा रहता ही नहीं। जब काट लिया फिर उसकी लावण्यता खत्म हो जाती है। तो उसको भी ज्ञान है। उसको एकेन्द्रिय का ज्ञान है। आपको पंचेन्द्रिय का ज्ञान है। चींटी को तीन इन्द्रिय का ज्ञान है। मक्खी को चार इन्द्रिय का ज्ञान है। प्रश्नकर्ता : पेड़ को कौन सी इन्द्रिय का ज्ञान है? दादाश्री : वो स्पर्शेन्द्रिय का ज्ञान है। उसको हाथ लगाया तो मालूम हो जाता है, उसको काट दिया तो मालूम हो जाता है और दु:ख भी होता है। जिधर कुछ न कुछ ज्ञान है, वहाँ भगवान है। दूसरी जगह पर भगवान नहीं है। इस घड़ी को कुछ ज्ञान नहीं है, तो इसमें भगवान नहीं है। भगवान खुद ज्ञान स्वरूप ही है। वो जो दूसरा चलता-फिरता है, वो अनात्मा है, कम्प्लीट अनात्मा है। लेकिन इसके अंदर भगवान है, इसलिए वो चंचल दिखता है। आत्मा का स्थान कहाँ?प्रश्नकर्ता : इंसान के शरीर में आत्मा का निवास कहाँ है? दादाश्री : ऐसा निवास नहीं है, एक जगह पर। प्रश्नकर्ता : ऐसा सुना है कि आत्मा हार्ट की जगह पर है। दादाश्री : वो बात करेक्ट नहीं है, रियल करेक्ट नहीं है। प्रश्नकर्ता : तो रियल फैक्ट क्या है? दादाश्री : रियल में आत्मा तो ये शरीर को जिधर पिन लगाते हैं और इफेक्ट होता है, दु:ख (दर्द) होता है, वहाँ सब जगह पर आत्मा है। हेयर (बाल) कटिंग करता है और नेईल (नाखून) कटिंग करता है, उसमें आत्मा नहीं है। बाल काटो तो दु:ख नहीं होता, तो बाल में आत्मा नहीं है और ये नाखून काटो तो भी दु:ख नहीं होता, तो नाखून में भी आत्मा नहीं है। जिधर दु:ख होता है, वहाँ आत्मा है। (पृ.१६)प्रश्नकर्ता : यहाँ हाथ पर पिन चुभाई तो उसका असर मन को होता है और मन तो आत्मा नहीं है। दादाश्री : नहीं, मन तो फिज़िकल है, कम्प्लीट फिज़िकल है। लेकिन वो आँख से देखा जा सके ऐसा फिज़िकल नहीं है। प्रश्नकर्ता : लेकिन फिज़िकल तो ये शरीर है न? दादाश्री : माइन्ड इज़ फिज़िकल, बॉडी इज़ फिज़िकल ऐन्ड स्पीच इज़ फिज़िकल! प्रश्नकर्ता : तो आत्मा कहाँ है? दादाश्री : वो यह शरीर में ही है। प्रश्नकर्ता : कोई ऐसे विशेष स्थान में होना चाहिए न? दादाश्री : नहीं, वो कोई एक जगह पर नहीं है। जिधर पिन लगाने से असर होता है, वहाँ आत्मा है। कभी शरीर का पार्ट खत्म हो जाता है, खून बंद हो जाता है, पक्षाघात हो जाता है, उस भाग में आत्मा नहीं है। अज्ञानी को भी वो अलग है, लेकिन उसकी बिलीफ रोंग है। उसकी जो बिलीफ रोंग है और रोंग ज्ञान है, उसे तोड़ने वाला कोई नहीं मिला है। इसलिए ऐसे ही बिलीफ में और बिलीफ में उल्टा चला गया। कभी ‘ज्ञानी पुरुष’ ये रोंग बिलीफ तोड़ दे, फ्रेक्चर कर दे तो फिर वो मुक्त हो जाता है। प्रश्नकर्ता : अंदर जो भगवान हैं, हम उनका ही कुछ हिस्सा है? दादाश्री : देखो न, भगवान ऐसी वस्तु है किउसका कोई पार्ट नहीं हो सकता है। वो सर्वांश है। इसमें अंश नहीं होता है। आप बोलते हैं कि मैं इनका पार्ट हूँ, वो गलत बात है। वो सच्ची बात नहीं है। आप खुद ही सर्वांश है, लेकिन भ्रांति से आपको मालूम नहीं है। भगवान कभी अंश रूप होते ही नहीं, सर्वांश ही होते हैं। वो अंश बोलते हैं, उसका क्या मतलब है कि उसको जो आवरण (पृ.१७)है, उसमें से अंश लाइट ही मिलती है। उसमें छेद करते हैं, पाँच छोटे छेद, तो उसमें से थोड़ी-थोड़ी लाइट मिलती है। उसमें जितने छेद करते हैं, उतनी ही लाइट मिलती है। वो लाइट भगवान की है। भगवान सर्वांश है लेकिन ये आवरण है, इसलिए इसमें से फुल लाइट नहीं मिलती। प्रश्नकर्ता : सभी आदमी ‘शुद्धात्मा’ हैं तो फिर पाप क्यों करते हैं? दादाश्री : ‘शुद्धात्मा हूँ’, वो उनकी बिलीफ में नहीं है। उनकी बिलीफ में तो ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ ऐसा है। वो रोंग बिलीफ चली जाएगी, फिर पाप नहीं करेगा। चेतन तत्त्व को देखना कैसे?प्रश्नकर्ता : यह आत्मा क्या है? दादाश्री : ये आकाश है न, वो आपको दिखता है? लेकिन लगता है न कि आकाश जैसी कोई चीज़ है! ऐसे ही आत्मा अरूपी है। हम आत्मा को सभी में देख सकते हैं। (जिन्होंने) ज्ञान लिया है, वो सब लोग आत्मा को दिव्यचक्षु से देख सकते हैं और हम आत्मा के अनुभव में रहते हैं। आत्मा की हाज़िरी से ही सबकुछ चल रहा है। वो कुछ नहीं करता, सिर्फ ऑब्ज़र्वर (निरीक्षक) की तरह रहता है। आदमी बनाना, ऐसा काम वो नहीं करता। प्रश्नकर्ता : तो फिर वो है क्या? कि जब वो दिखता नहीं, हम उसको टच नहीं कर सकते? दादाश्री : वो समझ में आता है, अनुभव में आता है। प्रश्नकर्ता : वो कैसे अनुभव में आता है? दादाश्री : जैसे ये शक्कर होती है न, उसको सब बोलते हैं (पृ.१८)कि मीठी है। लेकिन जहाँ तक जीभ के ऊपर नहीं रखी, वहाँ तक आप बोलेंगे कि मीठी यानी क्या? वो तो जब जीभ ऊपर रखेंगे, तब मालूम हो जाएगा। ऐसा आत्मा का अनुभव हो जाए तब मालूम हो जाता है। आत्मा का अनुभव कैसे होता है? अभी आपको थोड़ा आनंद हुआ है कि नहीं हुआ है? प्रश्नकर्ता : बहुत हुआ है। दादाश्री : ये आत्मा का आनंद है। ऐसा आनंद रोज़ मिल जाए, जिसमें बाहर की कोई भौतिक चीज़ नहीं है। ऐसे ही आनंद हो जाए, तो आपको समझ जाने का कि आत्मा का पहला गुण देखा। फिर दूसरा गुण पकड़ने का, फिर तीसरा गुण पकड़ने का। ऐसे सब गुण मिल जाएँगे। लेकिन पहला आनंद से पकड़ने का। आपको कुछ आनंद हुआ? प्रश्नकर्ता : होता है। जब सवाल का जवाब मिलता है, तब आनंद होता है। दादाश्री : आनंद भी दो प्रकार के हैं। एक, भौतिक आनंद है, वो मानसिक आनंद है और दूसरा, आत्मा का आनंद है। मानसिक आनंद है, वो मन खुश हो गया कि होता है और आत्मा का आनंद, आत्मा का ज्ञान मिलने से होता है। ऐसे ज्ञान भी दो प्रकार के हैं। मन खुश हो जाए, ऐसा भी ज्ञान होता है। उससे मन इमोशनल रहता है, आकुल-व्याकुल रहता है और दूसरा, ऐसा भी ज्ञान होता है, कि खुद को प्रकाश मिलता है। उसमें निराकुलता होती है। विशेष परिणाम का सिद्घांत!प्रश्नकर्ता : सिद्घगति की प्राप्ति ‘शुद्घात्मा’ होने के बाद ही होती है न? दादाश्री : ‘शुद्घात्मा’ हुआ यानी पूर्णत्व हो जाएगा और पूर्णत्व हो गया कि सिद्घगति होती है। शुद्घात्मा हुए बिना कुछ नहीं होता। (पृ.१९)प्रश्नकर्ता : यानी क्रोध-मान-माया-लोभ जो बाधक हैं, वे गए कि आदमी शुद्घात्मा हुआ? दादाश्री : वो क्रोध-मान-माया-लोभ अज्ञानता से ही हैं। क्रोध-मान-माया-लोभ ही सब को दु:ख देते हैं, नहीं तो आत्मा को दु:ख कैसा? अज्ञानता से ही दु:ख होता है। ‘मैं कौन हूँ’, उसकी अज्ञानता है। अज्ञानता क्यों घुस गई? क्या आत्मा अज्ञानी है? नहीं, आत्मा अज्ञानी नहीं है! आत्मा खुद ही ज्ञान है। तो ज्ञान है, वो अज्ञान हो जाता है? नहीं, ज्ञान है, वो अज्ञान नहीं होता है। ये तो विशेष परिणाम है!! छ: मूल अविनाशी तत्त्वों में जड़ और चेतन जब सामीप्य (सम्यर्क) में आते हैं, तब विशेष परिणाम उत्पन्न होता है। बाकी के चार तत्त्वों को एक-दूसरे के संयोग में कोई असर नहीं होता। चेतन और जड़ का संयोग हुआ कि विशेष परिणाम उत्पन्न होता है। इसमें जड़ का और चेतन का, अपना गुणधर्म तो रहता ही है, लेकिन विशेष गुण एक्स्ट्रा (अतिरिक्त) उत्पन्न हो जाता है। प्रकृति उत्पन्न हो जाती है। इसमें किसी को भी कुछ करने की ज़रूरत नहीं। विशेष परिणाम उत्पन्न होने से जगत् में ये अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं। अवस्थाएँ विनाशी हैं और निरंतर परिवर्तनशील हैं। इसमें आत्मा को कुछ करना नहीं पड़ता। उसका विशेष भाव हुआ कि पुद्गल (जो पूरण और गलन होता है) परमाणु खिंचे चले आते हैं। फिर वो ऑटोमैटिक मूर्त हो जाते हैं और अपना कार्य करते रहते हैं। प्रश्नकर्ता : यह विशेष परिणाम की बात कुछ उदाहरण देकर समझाइए। दादाश्री : संयोग से ही विशेष परिणाम उत्पन्न होता है, जैसे संगमरमर (मार्बल) के पत्थर सुबह में ठंडे रहते हैं और दोपहर में क्या हो जाते हैं? प्रश्नकर्ता : सूर्य की गरमी से गरम हो जाते हैं। (पृ.२०)दादाश्री : हाँ। तो गरम होना, वो पत्थर का स्वभाव नहीं है और सूर्य का भी ऐसा स्वभाव नहीं है। दोनों के संयोग से विशेष परिणाम होता है। सूर्य का संयोग होने से पत्थर में गरमी उत्पन्न होती है। उसको व्यतिरेक गुण बोला जाता है। वो खुद का गुण नहीं है, दोनों का साथ हो जाने से तीसरा गुण उत्पन्न होता है। ऐसा ये क्रोध-मान-माया-लोभ हैं, वो अपना खुद का गुण नहीं है यानी चेतन का गुण नहीं है और जड़ का भी गुण नहीं है। आपको क्या लगता है? ये क्रोध-मान-माया-लोभ चेतन का गुण है या जड़ का? किसका गुण है? प्रश्नकर्ता : जड़ का गुण है। दादाश्री : तो फिर यह टेपरिकॉर्डर क्रोध क्यों नहीं करता? ये टेबल को जला दो, तोड़ दो, फिर भी क्रोध क्यों नहीं करता है? प्रश्नकर्ता : तो वो चेतन का गुण हुआ? दादाश्री : क्रोध-मान-माया-लोभ हैं, वो चेतन का गुण हो तो कोई मोक्ष में जाता ही नहीं। वो चेतन का भी गुण नहीं है और जड़ का भी गुण नहीं है। चेतन और जड़ की मिश्रण स्थिति है, मिश्रस्थिति। चेतन तो शुद्घ ही है, वो जड़ भी शुद्घ है। दोनों का मिश्रण होता है, तो मिश्रचेतन बोला जाता है। वो दरअसल चेतन नहीं है। तो क्रोध-मान-माया-लोभ वो व्यतिरेक गुण हैं यानी आत्मा की हाज़िरी से उत्पन्न होने वाला गुण है और मिश्रचेतन का गुण है। वो जड़ का गुण नहीं है और शुद्ध चेतन का भी गुण नहीं है। सब लोग क्या कहते हैं कि क्रोध-मान-माया-लोभ का क्षय करो। लेकिन क्या क्षय कर सकते हैं आप? आप जानते ही नहीं कि कहॉं से आया है? कहॉं जाता है? उसका उद्भवस्थान क्या है? कैसे विलय हो सकता है? ये क्रोध-मान-माया-लोभ हैं, वो गुरु-लघु स्वभाव के हैं और आत्मा अगुरु-लघु स्वभाव का है। इगोइज़म गुरु-लघु स्वभाव वाला है, राग-द्वेष गुरु-लघु स्वभाव (पृ.२१)वाले हैं, क्रोध-मान-माया-लोभ गुरु-लघु स्वभाव वाले हैं और आत्मा अगुरु-लघु स्वभावी है । दरअसल चेतन में क्रोध-मान-माया-लोभ कुछ भी नहीं है, वो परमानंद स्थिति है। वो ही आत्मा है, वो ही परमात्मा है। लेकिन ये रोंग बिलीफ से ‘मैं ये हूँ, मैं रवीन्द्र हूँ’ ऐसा मानता है, वो ही मिश्रचेतन है और मिश्रचेतन को ही जगत् के लोग चेतन मानते हैं। जड़ और चेतन का संयोग हुआ कि विशेष परिणाम उत्पन्न होता है। अभी आपको ज्ञान मिल गया कि ‘मैं शुद्घात्मा हूँ’, तो आपको ख्याल आ जाएगा कि संयोग ही दु:खदायी है। तो आप संयोग से दूर हट जाएँगे तो संयोग भी हट जाएगा। संयोग हट गए फिर अज्ञान होता ही नहीं। संयोग से दूर हुआ, फिर विशेष परिणाम भी नहीं होता। जैसे आपने सागर किनारे से आधा मील दूर नए लोहे की दो ट्रक रख दी। फिर बारह महीने के बाद देखेंगे तो लोहे को कुछ हो जाएगा? क्या हो जाएगा? प्रश्नकर्ता : ज़ंग लग जाएगा। दादाश्री : वो किसने किया? लोहे ने खुद ने किया? प्रश्नकर्ता : नहीं। दादाश्री : तो किसने किया? प्रश्नकर्ता : दोनों के मिश्रण से हुआ। दादाश्री : वो दोनों का संयोग हो गया, तो संयोग से ज़ंग उत्पन्न होता है। वैसे ये क्रोध-मान-माया-लोभ हैं, वो जड़ और चेतन के संयोग से उत्पन्न होते हैं। ‘मैं खुद रवीन्द्र हूँ’ ऐसा मानते हैं, इससे क्रोध-मान-माया-लोभ उत्पन्न होते हैं। जो आप खुद नहीं हैं, वहाँ आप बोलते हैं कि ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ और जो आप हैं, उसकी आपको समझ नहीं है। ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ यह आरोपित भाव है, यह सच्चा भाव नहीं है। यह आरोप करते हैं, तो ‘रवीन्द्र’ की सब ज़िम्मेदारी ‘आपको’ (पृ.२२)ले लेनी पड़ती है और आरोप करने से ही कर्म बंधते हैं। फिर उसका कर्मफल भुगतना पड़ता है। हम आरोपित भाव नहीं करते हैं। ‘मैं अंबालाल हूँ’ ऐसा ड्रामेटिक बोलते हैं। और आप ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ ऐसा सच्चा बोलते हैं। जिसको ज्ञान मिलता है, उसको कर्म नहीं लगता, क्योंकि आरोपित भाव चला जाता है। आरोपित भाव को ही इगोइज़म बोलते हैं। अपने खुद में ‘मैं हूँ’ बोले तो कोई हर्ज नहीं, क्योंकि खुद है ही। जिसका अस्तित्व है, वो बोल सकता है कि, ‘मैं हूँ।’ लेकिन खुद नहीं है, वह बोलना आरोपित भाव है। अस्तित्व (का भान) तो बकरी को भी रहता है। बकरी बोलती है न, ‘मैं मैं’ और सब लोग भी बोलते हैं, ‘मैं हूँ, मैं हूँ।’ तो अस्तित्व तो है, इसलिए ही बोलते हैं कि ‘मैं रवीन्द्र हूँ’। तो ये प्रूव हो जाता है कि अस्तित्व तो है और जब शरीर निश्चेतन हो गया तो फिर ‘मैं हूँ’ कुछ नहीं बोलता, तो फिर अस्तित्व नहीं है। अस्तित्व है तो वस्तुत्व होना चाहिए लेकिन वस्तुत्व का ख्याल नहीं आता कि ‘मैं कौन हूँ’। इसलिए ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ बोलते हैं। ‘मैं इसका फादर हूँ’ बोलते हैं। ‘ये हूँ, वो हूँ’ बोलते हैं, इसीलिए तो सच्ची बात क्या है, वो वस्तु समझ में नहीं आती है। वस्तुत्व का भान कराना, वो तो ‘ज्ञानी पुरुष’ का काम है। आप वस्तुत्व में क्या हैं, वो आपको मालूम नहीं। आप वस्तुत्व में क्या हैं, वो हमें मालूम हैं। हम वो देख भी सकता है कि आप कौन हैं! प्रश्नकर्ता : मैं नहीं देख सकता। दादाश्री : आपको तो ये चर्मचक्षु हैं न? हम दिव्यचक्षु देते हैं फिर आप भी देख सकते हो। अस्तित्व का भान सब जीव को है। ‘मैं हूँ, मैं हूँ’ ऐसा अस्तित्व का भान सब को है। ‘मैं हूँ, मैं हूँ’, ऐसा बकरी भी मानती है, कुत्ता भी मानता है, उस पेड़ को भी ऐसा रहता है। लेकिन ‘मैं कौन हूँ?’ वो नहीं जानते हैं। अस्तित्व का भान सब को है, लेकिन वस्तुत्व का भान नहीं है। वस्तुत्व का भान हो गया, फिर पूर्णत्व ऐसे ही हो जाता (पृ.२३)है, दूसरा कोई कराने वाला नहीं। शुद्घात्मा हो गया, वस्तुत्व का भान हो गया तो ऐसे ही पूर्णत्व हो जाएगा। विश्व के सनातन तत्त्व!आत्मा इस देह के साथ ‘कम्पाउन्ड’ नहीं हो गया है, मिक्स्चर है सिर्फ। ‘कम्पाउन्ड’ हो जाए तो आत्मा का गुणधर्म चला जाएगा और देह का गुणधर्म भी चला जाएगा। लेकिन ये मिक्स्चर है, तो आत्मा का गुणधर्म पूरा है और देह का भी गुणधर्म पूरा है। इस अँगूठी में सोना है और तांबा भी है, लेकिन कम्पाउन्ड नहीं हुआ तो अलग कर सकते हैं। वैसे ही ज्ञानी पुरुष आत्मा और जड़ को अलग कर सकते हैं। ये संसार समसरण है। समसरण यानी दुनिया में जो तत्त्व हैं, छ: परमानेन्ट तत्त्व, वो निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। परिवर्तन से एक-दूसरे से इकट्ठे होते हैं और इससे, ये संयोग मिलने से अलग तरह का प्रकाश हो जाता है। बस, ऐसे ही दुनिया हो गई है। भगवान को कुछ करने की ज़रूरत नहीं। उनकी हाज़िरी से ही सब चल रहा है। प्रश्नकर्ता : जब तक ये पृथ्वी घूमती रहेगी, तब तक ये जन्म होते ही रहेंगे और जब पृथ्वी रूक जाएगी तो सब खत्म हो जाएगा? दादाश्री : पृथ्वी घूमती कभी बंद होने वाली ही नहीं। वो ऐसे ही घूमती रहेगी। सब परिवर्तनशील हैं। आप कल आए थे, तब जो ‘दादाजी’ देखे थे, वो आज नहीं हैं। आज दूसरे हैं। समय-समय पर सब परिवर्तन होता है। सब चीज़ समय-समय पर परिवर्तित होती ही हैं, लेकिन अपनी इतनी आइसाइट (दृष्टि) नहीं है कि हम वो देख सकें। प्रश्नकर्ता : कल जो देखा और आज जो देखता हूँ, उसमें भगवान अलग-अलग हैं और रूप एक ही है? दादाश्री : नहीं, सब परिवर्तन होता है। संसार यानी सब चीज़ों (पृ.२४)में परिवर्तन ही हो रहा है, उसका नाम ही संसार है और आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता है। आत्मा परमानेन्ट है। टेम्परेरी सब परिवर्तन ही हो रहा है। एक ‘स्पेस’ में सब लोग नहीं रहे सकते न? तो सब की ‘स्पेस’ अलग-अलग है। समय सभी के लिए एक रहता है। अभी दस बजे हैं तो सभी के लिए दस बजे हैं। लेकिन ‘स्पेस’ अलग है और इसलिए भाव भी अलग हैं। आपका भाव अलग, इसका भाव अलग, उसका भाव अलग। ऐसे सब भिन्न-भिन्न हैं। सारी दुनिया साइन्स है। आत्मा भी साइन्स है। साइन्स के बाहर दुनिया नहीं है। बड़े-बड़े पुस्तक हैं, ग्रंथ हैं, लेकिन समझ में नहीं आने से पज़ल बन गए हैं। जब तक ‘स्वरूप’ समझ में नहीं आया, तब तक द वल्र्ड इज़ पज़ल इटसेल्फ। किसी ने पज़ल नहीं किया, स्वयं ही पज़ल हो गया है। ‘अक्रम मार्ग’ से सब नई बातें हम बताते हैं। एक आत्मा पर आ जाओ, और अनात्म विभाग में तो दूसरे पाँच विभाग हैं। ये सब समझने की ज़रूरत है। प्रश्नकर्ता : पृथ्वी, तेज (अग्नि), वायु, आकाश, जल ये पांच तत्त्वों के सिवा जगत् में और कुछ है ही नहीं? दादाश्री : नहीं, और भगवान भी है न! प्रश्नकर्ता : ये पांच तत्त्वों का कॉम्बिनेशन वो ही भगवान है? दादाश्री : नो, नो, नो, नो। वो पाँच तत्त्व तो अनात्म विभाग है और भगवान आत्म विभाग है। भगवान चैतन्य है और ये पाँच तत्त्व जड़ हैं। ये दुनिया में छ: परमानेन्ट तत्त्व हैं, वो आपको ख्याल है? प्रश्नकर्ता : आकाश, पृथ्वी, तेज, वायु, जल, आत्मा? दादाश्री : नहीं, ये पानी है, वो भाप हो जाती है, बर्फ हो (पृ.२५)जाता है। तो वो परमानेन्ट नहीं है। पृथ्वी चेन्ज हो जाती है, वो परमानेन्ट नहीं है। वायु तो डी-कम्पोज़ हो जाता है, इकट्ठा भी हो जाता है। वो चेन्ज होता है, तो वो परमानेन्ट नहीं है। तेज भी विनाश हो जाता है। पृथ्वी, तेज, वायु, जल, ये चारों मिलाकर एक ही अविनाशी तत्त्व है। जिसको रूपी तत्त्व बोला जाता है। ये चारों एक ही तत्त्व की अवस्थाएँ हैं। ये जल, वायु, तेज, पृथ्वी, वो सभी तो जीव हैं। जलकाय जीव है, उसका शरीर कैसा है? जल ही उसका शरीर है। वायु, वो वायुकाय जीव का शरीर है। तेज में तेजकाय जीव है, इन सभी जीवों का शरीर ही जलता है। पृथ्वी वो पृथ्वीकाय जीव है। इन चारों के अंदर जीव है। वो चेतन तत्त्व है, वो परमानेन्ट तत्त्व है और दूसरा एक तत्त्व ‘रूपी तत्त्व’ भी है, उसको पुद्गल तत्त्व बोला जाता है। इन दोनों का साथ में मिक्स्चर हो गया है। पुद्गल, यानी जो पूरण होता है, गलन होता है। फिर पूरण होता है, फिर गलन होता है। लेकिन वो परमाणु स्वरूप से परमानेन्ट है और पुद्गल के स्वरूप से वो विनाशी है। ये एटम है, इससे भी परमाणु बहुत छोटा है। एटम का विनाश होता है, लेकिन परमाणु का विनाश नहीं होता। वो एक ही पुद्गल तत्त्व है। प्रश्नकर्ता : परमाणु जो हैं वो अनादि हैं, उसका क्या कारण है? दादाश्री : परमाणु वो तो अविनाशी हैं और परमानेन्ट हैं, इसलिए वो अनादि ही हैं। प्रश्नकर्ता : परमाणु यानी प्रकृति? दादाश्री : परमाणु से प्रकृति में हेल्प होती है। प्रकृति है वो सब परमाणु ही है लेकिन प्रकृति एक चीज़ से नहीं होती है, प्रकृति में दूसरी चीज़ें भी हैं। ये प्रकृति है, इसमें परमाणु भी हैं और इसमें आने-जाने की शक्ति भी है। प्रश्नकर्ता : इन परमाणुओं का स्वतंत्र अस्तित्व है? दादाश्री : हाँ, स्वतंत्र अस्तित्व है। जितना आत्मा का स्वतंत्र अस्तित्व है, उतना ही परमाणु का भी स्वतंत्र अस्तित्व है। आत्मा भी अविनाशी है। परमाणु भी अविनाशी हैं। (पृ.२६)अपने शास्त्रों में क्या बोलते हैं कि ये शरीर है, प्रकृति है वो पाँच तत्त्व का मिलन है। वो पाँच तत्त्व - पृथ्वी, जल, वायु, तेज और आकाश को कहा है। लेकिन इसमें आकाश के अलावा जो चार तत्त्व हैं, वो सब अकेले परमाणु में आ जाते हैं। क्योंकि ये परमाणु से पृथ्वी हो गई, परमाणु से जल भी हो गया, परमाणु से वायु भी हो गया, परमाणु से ही तेज भी हो गया लेकिन आकाश तो स्वतंत्र है, बिल्कुल स्वतंत्र है। जिस तरह परमाणु स्वतंत्र हैं, उसी तरह आकाश भी स्वतंत्र है। दूसरा, आने-जाने की जो क्रिया होती है, यह जो पुद्गल है, उसको इधर से उधर ले जाने के लिए कोई एक तत्त्व की ज़रूरत है। चेतन में आने-जाने की कोई शक्ति नहीं है। मनुष्य को आने-जाने के लिए यह तत्त्व की ज़रूरत है। वह गतिसहायक तत्त्व है। वह भी स्वतंत्र है। कोई चीज़ चलती है, तो फिर चलती ही रहेगी। उसकी गति चालू हो गई, फिर बंद नहीं होगी। तो उसे ठहरने के लिए, स्थिर होने के लिए भी एक तत्त्व चाहिए, वो स्थितिसहायक तत्त्व है और ‘काल’ ये भी एक तत्त्व है। ऐसे छ: स्वतंत्र तत्त्व हैं, उससे ही ये जगत् बना हुआ है, और कोई सातवाँ तत्त्व नहीं है। ये छ: तत्त्व निरंतर समसरण करते हैं, परिवर्तन होता रहता है। इससे यह पज़ल हो गया है। खुद से ही पज़ल हो गया है। किसी ने पज़ल बनाया नहीं है। प्रश्नकर्ता : तो पज़ल भी सनातन है? दादाश्री : नहीं, पज़ल सनातन नहीं है। पज़ल तो सॉल्व हो जाता है। प्रश्नकर्ता : ‘ज्ञानी’ का सॉल्व हो जाता है, लेकिन दूसरे सभी के लिए तो परमानेन्ट ही है? दादाश्री : ऐसा है, वो अनुभव परमानेन्ट है, लेकिन ऐसा (पृ.२७)कायदेसर (नियमामुसार) परमानेन्ट नहीं है। परमानेन्ट है, इसको सत् बोला जाता है। सत् है वो अविनाशी होता है। ये पज़ल है वो अवस्था है और अवस्था मात्र विनाशी है। बस, छ: अविनाशी तत्त्व हैं और उसकी जो अवस्था होती है, वो सब विनाशी है। ये शरीर अवस्था है, ये पेड़-पत्ते अवस्था है, मूल तत्त्व नहीं हैं। मूल तत्त्व अविनाशी है और उसकी अवस्था है, वो सब विनाशी है। और सब लोग अवस्था को ही बोलते हैं कि ‘मैं हूँ, मैं हूँ।’ लोग विनाशी को ‘मैं हूँ’ बोलते हैं। अपना खुद का तत्त्व समझ में आ जाए कि मेरा खुद का तत्त्व अविनाशी है। लेकिन अवस्था को ‘मैं हूँ’ बोलते हैं, इससे खुद भी विनाशी हो जाता है। परमाणु हैं वो अविनाशी हैं लेकिन एक परमाणु है ऐसे अनेक परमाणु (इकट्ठे) हो गए तो अवस्था हो गई। वो अवस्था विनाशी है। फिर परमाणु सब बिखर गए तो परमाणु अविनाशी हैं। बिना आकाश तो जगह नहीं है। आकाश यानी अवकाश, स्पेस! सब जगह पर आकाश ही है। आप बैठे हैं, वो भी आकाश में ही बैठे हैं। अवकाश का आकाश हो गया है। अवकाश अविनाशी तत्त्व है। प्रश्नकर्ता : पेड़ में भी जीव है न? दादाश्री : हाँ, है। जो भी जीव हैं वो सभी दिखते हैं, चेतन नहीं दिखता। प्रश्नकर्ता : पत्थर में भी जीव है? दादाश्री : पत्थर में अंदर जीव रहता है। लेकिन टूट गया फिर कुछ नहीं और कुछ पत्थर में, जो काला पत्थर रहता है, जिसको लावा-रस (जमा हुआ लावा) बोलते हैं, उसमें कोई जीव नहीं है। जो सफेद पत्थर है या लाल पत्थर है, उसके अंदर जीव है। वो सब पृथ्वीकाय जीव है। पानी भी जीव है। पानी भी जीव का ही बना हुआ है। वो अपकाय जीव है। अप यानी पानी और काय यानी शरीर, पानी रूपी शरीर जिसका है वो जीव, उसका शरीर ही पानी का है। (पृ.२८)बैक्टीरिया बोलते हैं, वो अलग हैं, वो तो माइक्रोस्कोप से देख सकते हैं और अपकाय नहीं देख सकते, वो जीव का पानी रूपी शरीर है। हवा भी जीव है, वो वायुकाय जीव है। ये अग्नि है न, उसमें जो लाल-लाल चमकता है, वो भी जीव है, वो खुद ही तेजकाय जीव है। रूप-रंग आत्मा में नहीं होता है। जो अनात्मा है, उसमें रूप-रंग रहता है। काला, पीला, लाल, सफेद, वो सब रंग और ऐसा मोटा, पतला, ऊँचा, नीचा, वो भी सब अनात्म विभाग का है। आत्मा में, चेतन में ऐसा नहीं है। चेतन तो परम ज्योति स्वरूप है। ये आँख है, कान है, इन्द्रिय हैं, इन सब से जो ज्ञान जान लिया, वो सब रिलेटिव करेक्ट है और वो टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट है, नॉट परमानेन्ट! प्रश्नकर्ता : तो इन्द्रियों से जो ज्ञान होता है, वह ज्ञान नहीं है? दादाश्री : वो रिलेटिव ज्ञान है एन्ड ऑल दीज़ रिलेटिव आर टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट, नॉट अ सिंगल एडजस्टमेन्ट इज़ परमानेन्ट इन दिस वल्र्ड!! चेतन है, वो भी परमानेन्ट है और जड़ है, वो भी परमानेन्ट है। जो जड़ परमाणु स्वरूप का है वो परमानेन्ट है। लेकिन परमाणु (को) आँख से नहीं देख सकते, अणु को देख सकते हैं, लेकिन परमाणु को कोई नहीं देख सकता। वो तो ‘ज्ञानी पुरुष’ और तीर्थंकर ही देख सकते हैं। जिसको परमाणु बोलते (कहते) हैं, फिर ये परमाणु पुद्गल होते हैं। ये परमाणु सब इकट्ठे होकर पुद्गल होता है, उसे स्कंध कहते हैं। परमाणु आँख से देख सके ऐसा नहीं होता। लेकिन स्कंध को आँख से देख सकते हैं। लेकिन वो भी परमाणु का ही है और निश्चेतन चेतन है। प्रश्नकर्ता : निश्चेतन चेतन है तो उसे चेतन क्यों बोला? दादाश्री : वो ही समझने का है। वो चेतन नहीं है, निश्चेतन चेतन है। चेतन जैसा दिखता है, लक्षण चेतन जैसे हैं, लेकिन गुणधर्म चेतन का नहीं है। (पृ.२९)कोई आदमी ने घड़ी को चाबी दिया, फिर वो घड़ी चलती है, ऐसे वह चार्ज हो गया है, और वही डिस्चार्ज होता है। पिछले जन्म में चार्ज हो गया था, वो ही अभी इस जन्म में डिस्चार्ज होता है। जन्म से मृत्यु पर्यंत डिस्चार्ज होता है और (साथ-साथ) उसी समय अंदर चार्ज भी हो रहा है। वो ही आगे के जन्म में फिर डिस्चार्ज हो जाएगा। चार्ज दो प्रकार के हैं। कई लोग सभी लोगों को सुख हो ऐसे ही कार्य करते हैं तो जगत् इसमें खुश होता है कि ये सही है। जो सब के लिए अच्छा कर्म करता है, तो सब लोग उसको मान्य करते हैं। लेकिन इसका भी चार्ज होता है, ये पॉज़िटिव चार्ज है। कई आदमी दूसरों को दु:ख देते हैं, वो नेगेटिव चार्ज है। मुख्य बात तो चार्ज नहीं होना वो ही है। चार्ज बंद हो गया तो फिर चिंता नहीं होती है और संसार में भी रह सकता है। रवीन्द्र तो नाम दिया है, आपको पहचानने के लिए। जैसे दुकान का नाम होता है कि जनरल ट्रेडर्स, तो वो क्या मालिक का नाम है? और मालिक को कोई बोलेगा कि, जनरल ट्रेडर्स, इधर आओ, इधर आओ! ऐसा ‘रवीन्द्र’ तो दुकान का नाम है। इसमें छ: पार्टनर हैं। इस कंपनी में छ: पार्टनर हैं और जब शादी करता है, तब फिर ये दूसरे छ: पार्टनर जुड़े तो 6+6 का कॉर्पोरेशन हो गया। फिर एक लड़का हुआ तो और छ: पार्टनर जुड़े, लड़की हुई तो और छ: पार्टनर जुड़े, फिर सब पार्टनर झगड़ते हैं अंदर ही अंदर, मारामारी, लट्ठाबाज़ी!! ये छ: पार्टनर अपना-अपना काम संभाल लेते हैं। हमें अपना काम संभाल लेना है। लेकिन हम इगोइज़म करते हैं कि, ‘मैं बोलता हूँ, ये सब मैंने किया।’ ‘मैंने किया’ ऐसा बोल दिया, फिर बाकी के सब पार्टनर आपके साथ पूरा दिन झगड़ते हैं। इसका कोर्ट में झगड़ा चलता है। फिर वाइफ के छ: पार्टनर आ गए, फिर तो कॉर्पोरेशन हो गया और झगड़ा बढ़ गया। प्रश्नकर्ता : छ: पार्टनर कौन हैं? (पृ.३०)दादाश्री : ये छ: पार्टनर क्या बोलने लगे कि, हम छ: पार्टनर होकर बिज़नेस चलाएँगे। तो पहला पार्टनर आया कि ‘भाई! बिज़नेस के लिए जगह हमारी!’ जगह चाहिए कि नहीं? वो आकाश देता है। अवकाश, वो वन ऑफ द पार्टनर्स है। दूसरा पार्टनर बोलता है कि, जो माल चाहिए, जितना चाहिए, उतना ले जाओ, हम देगा। माल हम भेज देगा, लेकिन कार्टिंग हम नहीं करेगा। मटीरियल सब पुद्गल देता है। तीसरा भागीदार, कार्टिंग वाला है। वो गति सहायक तत्त्व है। उसकी भी 1/6th पार्टनरशिप है। वो सब कार्टिंग कर देता है। माल लाने-ले जाने का काम वो करता है। जड़ में या चेतन में आने-जाने की शक्ति नहीं है। आने-जाने के लिए ये तत्त्व है। चौथा पार्टनर, स्थिति सहायक तत्त्व है। वो मटीरियल को स्थिर करता है। पाँचवाँ पार्टनर सब मैनेजमेन्ट करता है। वो सब टाइमिंग देता है। वो काल तत्त्व है। छठा, आत्म तत्त्व है। उसको क्या काम करने का? सिर्फ देख-भाल रखने की। आत्म तत्त्व ही एक ऐसा है, जिसमें चैतन्य है, ज्ञान-दर्शन है। ये आत्मा है न, वो आप खुद हैं। आपको सिर्फ देख-भाल रखने की थी कि, ‘सब क्या कर रहे हैं।’ उसके बदले आप बोलते हैं, ‘ये सब मैंने किया।’ तो पार्टनरों में झगड़ा हुआ। इसलिए सब पार्टनर कोर्ट में झगड़ा करते हैं। कमल और पानी में कोई झगड़ा नहीं है, ऐसा संसार और ज्ञान में कोई झगड़ा नहीं। दोनों अलग ही हैं। मात्र रोंग बिलीफ है। ‘ज्ञानी पुरुष’ सब रोंग बिलीफ को फ्रेक्चर कर देते हैं और संसार सब अलग हो जाता है। अभी आप ‘ज्ञानी’ से विमुख हैं। जब ‘ज्ञानी’ के सन्मुख हो जाएँगे, तब संसार छूट जाएगा। जगत् की वास्तविकता!प्रश्नकर्ता : मैं आपके पास ज्ञान जानने आया हूँ। दादाश्री : आपको रिलेटिव ज्ञान जानने का विचार है कि रियल ज्ञान जानने का विचार है? ज्ञान दो प्रकार के होते हैं। एक रिलेटिव ज्ञान है, दूसरा रियल ज्ञान है। रियल ज्ञान परमानेन्ट है और रिलेटिव (पृ.३१)ज्ञान टेम्परेरी है। तो आपको क्या जानने का विचार है? जो पुस्तक में लिखा गया, वो सब टेम्परेरी ज्ञान है। तो आपको क्या जानना है? प्रश्नकर्ता : परमानेन्ट ही जानना है। दादाश्री : जो वास्तविक है, वो परमानेन्ट है। प्रश्नकर्ता : ज्ञान जो है, वह परमानेन्ट होना चाहिए। टेम्परेरी ज्ञान से कोई फायदा नहीं होता। दादाश्री : सारी दुनिया में टेम्परेरी ज्ञान ही चलता है। वो टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट है, परमानेन्ट एडजस्टमेन्ट नहीं है। टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट क्यों बोला जाता है? क्योंकि इससे बहुत आगे जानने का है। संसार चलाने के लिए टेम्परेरी ज्ञान है लेकिन वास्तवमें जगत् क्या है, भगवान क्या है, जगत् कौन चलाता है, कैसे चलता है, ये सब रियल ज्ञान जानना चाहिए। वास्तविक जानना चाहिए। वास्तविक कोई पुस्तक में नहीं लिखा है। आपको क्या जानने का विचार है? हम दोनों बात बता देते हैं। वास्तविक भी और वो दूसरा भी बताते हैं। प्रश्नकर्ता : जो लिखा है वो तो बहुत कुछ जान चुका हूँ। दादाश्री : आप लिखा हुआ सब जान चुके हैं, लेकिन लिखा हुआ है, वो जानने में कुछ फायदा नहीं होता। वो सब टेम्परेरी ज्ञान है। हमने तय किया कि दूसरों के साथ झूठ नहीं बोलने का, सच ही बोलने का है। सब जगह पर लिखा है कि सच बोलना, लेकिन झूठ तो बोलना ही पड़ता है। क्योंकि वो टेम्परेरी ज्ञान है और परमानेन्ट ज्ञान जान लें तो फिर वो झूठ बोल ही नहीं सकता। परमानेन्ट ज्ञान तो खुद क्रियाकारी है। जो हम बोलते हैं, वो कभी पुस्तक में पढ़ी नहीं, कभी सुनी नहीं, ऐसी बातें बोलते हैं लेकिन हैं वास्तविक, यह आपका आत्मा कबूल करेगा। प्रश्नकर्ता : मैं ये ही चाहता हूँ। दादाश्री : ये सब लोग जानते हैं, वो प्राकृत ज्ञान जानते है। (पृ.३२)सच्चे ज्ञान की बात इसमें नहीं है। ये सब प्राकृत ज्ञान है। आत्मज्ञान चाहते हो, तो बोलने का कि आत्मज्ञान की बात में ‘मैं कुछ नहीं जानता हूँ’ ऐसा भाव होना चाहिए। नहीं तो इगोइज़म होता है कि ‘मैं कुछ जानता हूँ।’ प्रकृति उसको चलाती है, और बोलता है कि ‘मैं चलाता हूँ’। ऐसी उसको भ्रांति है। धर्म भी प्रकृति कराती है और बोलता है ‘मैं धर्म करता हूँ।’ तप करता है, वो प्रकृति कराती है। त्याग करता है, वो प्रकृति कराती है। चोरी करता है, वो प्रकृति कराती है। जहाँ तक पुरुष नहीं हुआ, वहाँ तक प्रकृति ही कराती है और पुरुष हो जाए तो काम हो गया। ‘ज्ञानी पुरुष’ की कृपा से पुरुष और प्रकृति अलग हो जाते हैं। पुरुष हो गया फिर सच्चा पुरुषार्थ होता है, नहीं तो वहाँ तक सच्चा पुरुषार्थ नहीं है। वो भ्रांति का पुरुषार्थ है। सब बोलते हैं कि आत्मज्ञान (प्राप्त) करो। लेकिन जहाँ तक आत्मज्ञान नहीं मिलता, वहाँ तक प्रकृतिज्ञान का अध्ययन करो, उसको जानो। ये शरीर में जो मिकेनिकल पार्ट्स हैं, वो सब प्रकृति है। इसमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। जैसे ये दाढ़ी के बाल ऐसे ही बढ़ते हैं न?! पुरुष धर्म समझना चाहिए और प्रकृति का धर्म भी समझना चाहिए। प्रकृति धर्म संसार चलाने के लिए समझना चाहिए और मोक्ष में जाने के लिए पुरुष धर्म समझना चाहिए। आप खुद कौन हो?दादाश्री : आपका नाम क्या है? प्रश्नकर्ता : रवीन्द्र। दादाश्री : रवीन्द्र तो आपका नाम है, आप खुद कौन हैं? प्रश्नकर्ता : मैं एक इंसान हूँ। दादाश्री : इंसान तो ये शरीर को कहते हैं। चार पैर हो तो पशु कहते हैं। तो आप खुद कौन हैं? प्रश्नकर्ता : रवीन्द्र ही हूँ। पहचान के लिए दिया हुआ नाम है। (पृ.३३)दादाश्री : आपका नाम रवीन्द्र है, ये तो हम भी कबूल करते हैं। जैसे कोई दुकान का बोर्ड हो कि जनरल ट्रेडर्स, तो उसके मालिक को हम बुलाएँ कि ‘हेय, जनरल ट्रेडर्स इधर आओ।’ तो कैसा होगा? रवीन्द्र तो आपको पहचानने का बोर्ड है। आप खुद कौन हैं? ‘मेरा नाम रवीन्द्र’ और ‘मैं रवीन्द्र’, इसमें कोई फर्क लगता है क्या? जैसे ‘ये शरीर मेरा है’ ऐसा कहते हो कि ‘मैं शरीर हूँ’ ऐसा कहते हो? प्रश्नकर्ता : ‘मेरा शरीर है’ ऐसा कहूँगा। दादाश्री : ‘मेरा माइन्ड’ कहते हो कि ‘मैं माइन्ड हूँ’ कहते हो? प्रश्नकर्ता : ‘मेरा माइन्ड’ कहता हूँ। दादाश्री : और स्पीच? प्रश्नकर्ता : ‘मेरी स्पीच’ कहता हूँ। दादाश्री : इसका मतलब ये कि आप माइन्ड, स्पीच और शरीर के मालिक हैं, तो आप खुद कौन हो? इसकी तलाश की है या नहीं? शादी की तब औरत तलाश करके लाए थे कि नहीं? तो खुद की ही तलाश नहीं की? ये सब तो रिलेटिव है और आप खुद रियल हैं। ऑल दीज़ रिलेटिव्स आर टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट्स ऐन्ड रियल इज़ परमानेन्ट। रियल बात एक बार करो तो फिर सभी पज़ल सॉल्व हो जाते हैं। भगवान को पहचानने के लिए एक ही रीत नहीं है, दूसरी भी बहुत रीत हैं। प्रश्नकर्ता : जगत् में सब से बड़ी डिफिकल्टी होगी तो वह भगवान को रियलाइज़ करने की है और उसके लिए सब से पहले जगत् को भूलना है। दादाश्री : हाँ, जगत् विस्मृत करने का है, लेकिन वो पहले भूला नहीं जा सकता है न?! भगवान का रियलाइज़ेशन हो गया तो जगत् भूला जाएगा। हम को फॉरेन वाले बोलते हैं कि, भगवान की (पृ.३४)पहचान करने के लिए शॉर्ट कट बता दो। तो हमने बताया कि सेपरेट, आइ ऐन्ड माइ विद सेपरेटर! ‘आइ’ कौन? ‘माइ’ क्या?आप जो ‘आइ’ बोलते हैं, वो सच्ची बात नहीं है। कोई पूछे कि ‘रवीन्द्र कौन है?’ तो पहले आप बोलते हैं कि ‘मैं रवीन्द्र हूँ।’ फिर पूछे कि ‘रवीन्द्र किसका नाम है?’ तो आप बोलते हैं कि ‘मेरा नाम है।’ यह विरोधाभास नहीं लगता आपको? ये सब विरोधाभास है, तो सेपरेट ‘आइ’ ऐन्ड ‘माइ’। पहले ये पाँव अलग रख दिया, ‘माइ फीट’, फिर हाथ अलग रख दिया, ‘माइ हैन्ड’। फिर सर अलग रख दिया, ‘माइ हेड’ और ‘माइ माइन्ड’ बोलते हैं कि ‘मैं माइन्ड हूँ’ बोलते हैं? प्रश्नकर्ता : ‘माइ माइन्ड।’ दादाश्री : तो उसको भी दूर रखने का। ‘माइ इगोइज़म’ बोलते हैं कि ‘मैं इगोइज़म हूँ’ बोलते हैं? प्रश्नकर्ता : ‘माइ इगोइज़म।’ दादाश्री : तो उसको भी दूर रखने का। फिर ‘मैं बुद्घि हूँ’ ऐसा बोलते हैं कि ‘मेरी बुद्घि’ ऐसा बोलते हैं? प्रश्नकर्ता : ‘माइ इन्टलेक्ट।’ दादाश्री : तो उसको भी दूर रखने का। मन-बुद्घि-चित्त-अहंकार सब अलग रखने का। सब अलग रख दिया, फिर क्या रहेगा? प्रश्नकर्ता : कुछ नहीं रहेगा। दादाश्री : ‘आइ’ रहेगा! ‘माइ’ चला गया, कि ‘आइ’ रहेगा। वो ही भगवान है, वो ही कृष्ण है। जिधर ‘माइ’ नहीं, वहाँ ‘आइ’ है, वो ही आत्मा है, वो ही परमात्मा है। अभी तो ‘माइ’ के चंगुल में आ गए हैं, इसलिए ‘ये मेरा, ये मेरा, ये मेरा’ करते हैं। (पृ.३५)हम लोनावाला गए थे। वहाँ हम को एक जर्मन ‘कपल’ मिला था। वो हम को बोलने लगा कि हमें गॉड (भगवान) बता दो। हमने बोल दिया कि सेपरेट ‘आइ’ ऐन्ड ‘माइ’ विद सेपरेटर। जो बाकी रहता है, वो ‘आइ’ है और ‘आइ’ इज़ गॉड। लेकिन सेपरेटर का डीलर मैं हूँ। सेपरेटर के बिना सेपरेट नहीं हो सकेगा। तो सेपरेटर मेरे पास से ले जाना। सेपरेटर तो चाहिए न? आप कहाँ तक सेपरेट करते जाएँगे? माइ माइन्ड, माइ इन्टलेक्ट, माइ इगोइज़म वहाँ तक जाएँगे। लेकिन इगोइज़म से आगे कैसे जाएँगे? जहाँ तक स्थूल है, वहाँ तक आप जाएँगे। लेकिन इसके आगे सूक्ष्म है और सूक्ष्म से आगे कारण है, कॉज़ (कारण) है। वो ‘समझ’ आप कहाँ से लाएँगे? वो तो हमारे पास है। ‘आइ’ ऐन्ड ‘माइ’ का सेपरेशन किया तो ‘आइ’ इज़ गॉड! लेकिन आप खुद से (अपने आप) पूरे सेपरेट नहीं हो सकेंगे। वो सेपरेट करने का काम ‘ज्ञानी पुरुष’ का ही है। वो हम आपको करवा देते हैं। कितने जन्मों से भटकते हैं, लेकिन सच्ची बात नहीं जानी। किस पुस्तक में ऐसी बात बताई है? और भगवान को तलाश करने के लिए कितनी पुस्तकें हैं?! और इतनी पुस्तकें पढ़कर भी किसी को भगवान नहीं मिले!!! पुस्तक तो क्या बताती है कि भगवान उत्तर में हैं और सब लोग दक्षिण में जाते हैं और बोलते हैं कि मैं भगवान की तलाश करने को जाता हूँ। प्रश्नकर्ता : ‘आइ’ को ‘माइ’ से सेपरेट कहाँ तक कर सकते हैं? जो रोज़ की ज़िंदगी है, वह ज़िंदगी भी तो चलानी है, उसमें तो धंधा है, व्यवहार है, रिलेटिव हैं, माँ-बाप हैं। दादाश्री : वो छोड़ने का नहीं है। वो तो आपकी समझ में रखने का कि दिस इज़ नॉट माइन, दिस इज़ नॉट माइन। औरत-लड़के सब रखने का, वो छोड़ देने की चीज़ नहीं है। वो तो रखने की चीज़ है। लेकिन समझ जाने का कि दिस इज़ ‘माइ’ ऐन्ड नॉट ‘आइ’। इतना समझ जाने का। (पृ.३६)बाहर से ‘दुकान’ सब चीज़ को बोल दिया कि दिस इज़ ‘माइ’ तो समझ गया कि दिस इज़ नॉट ‘आइ’। फिर एक शरीर के लिए आया तो दिस इज़ ‘माइ’, नॉट ‘आइ’। फिर ‘आइ’ की तलाश करो। हमने वो ही तलाश कर लिया। ऑल दीज़ रिलेटिव्स आर टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट। ‘माइ’ इज़ टेम्परेरी ऐन्ड ‘आइ’ इज़ परमानेन्ट। प्रश्नकर्ता : स्पिरिचुअल वेल्डिंग है और ये फिज़िकल वेल्डिं है यानी यह शरीर और आत्मा, दोनों में कुछ कनेक्शन है? दादाश्री : कनेक्शन है ही। लेकिन दोनों अलग हैं। प्रश्नकर्ता : कैसे? दादाश्री : आप दोनों को सेपरेट कर सकते हैं। प्रश्नकर्ता : आपके पास ये सेपरेट करने की कोई टेकनिक है या गिफ्ट है? दादाश्री : गिफ्ट है, ये नैचुरल गिफ्ट है। दिस इज़ बट नैचुरल। प्रश्नकर्ता : मुझे लगता है कि आपके पास कुछ टेकनिक होनी चाहिए कि जिससे ‘आइ’ और ‘माइ’ सेपरेट कर सके। दादाश्री : ये टेकनिक नहीं है, ये ‘विज्ञान’ है, ये ‘प्रकाश’ है। ये तो थ्योरी ऑफ एब्सल्यूटिज़म है, हम थ्योरम ऑफ एब्सल्यूटिज़म में है। हमारे पास एब्सल्यूट विज्ञान है। वो सब हम आपको बताते हैं। एब्सल्यूट विज्ञान कब प्राप्त होता है? ये शरीर का, मन का, वाणी का, सब का मालिकीभाव छूट जाता है, तब एब्सल्यूट विज्ञान प्राप्त होता है, नहीं तो नहीं होता। अध्यात्म में ब्लंडर क्या ? मिस्टेक क्या?आप ‘खुद’ भगवान ही हैं। आपका कोई ऊपरी (बॉस) ही नहीं है। हमने देखा है कि कोई भगवान भी आपके ऊपरी नहीं है। आपके बॉस कौन हैं? आपके ब्लंडर और मिस्टेक । वो चले जाएँ, (पृ.३७)तो आपका कोई ऊपरी नहीं है। ‘ज्ञानी पुरुष’ पहले ब्लंडर तोड़ देते हैं, फिर मिस्टेक आपको निकालनी चाहिए। ब्लंडर में क्या है? ‘मैं रवीन्द्र हूँ’, वो जो आपकी बिलीफ है, वो आरोपित भाव है। जिधर आप नहीं है, उधर आप बोलते हैं, कि ‘मैं हूँ।’ उसका भगवान के वहाँ क्या न्याय होता है? वो ब्लंडर बोला जाता है। जहाँ खुद है, वहाँ खुद की पहचान नहीं है। ‘मैं रवीन्द्र हूँ, मैं इसका फादर (पिता) हूँ, मैं इसका चाचा हूँ’, वो सब आरोपित भाव हैं। उसको ब्लंडर बोला जाता है। वो ब्लंडर चला जाए, फिर सिर्फ मिस्टेक ही रहेगी। सेल्फ रियलाइज़ेशन किया, फिर आरोपित भाव नहीं रहेगा, ब्लंडर नहीं रहेगा, मिस्टेक ही रहेगी। वो मिस्टेक आपको कैसे निकालने की, वो फिर ‘ज्ञानी पुरुष’ बता देंगे। प्रश्नकर्ता : आज इस दुनिया में ऐसा कोई है, जिसको ब्लंडर और मिस्टेक नहीं है? दादाश्री : हाँ, हमारे सब ब्लंडर और मिस्टेक चले गए हैं। हमारी एक भी स्थूल भूल नहीं है। स्थूल भूल तो सब लोग समझ जाते हैं कि इसने भूल की, वो स्थूल भूल बोली जाती है। दूसरी सूक्ष्म भूल होती है। सूक्ष्म भूल सब लोग नहीं जान सकते, लेकिन कोई बुद्घि वाला विचक्षण आदमी हो तो वो समझ जाता है कि इसने भूल की, ये सूक्ष्म भूल है। ऐसी स्थूल भूल और सूक्ष्म भूल हमारे में नहीं है। सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम भूल हैं, वो किसी को भी नुकसान नहीं करती हैं, दुनिया में कोई चीज़ को नुकसान नहीं करती हैं। इस शरीर के ओनर (मालिक) हैं आप? और स्पीच के ओनर हैं? और माइन्ड के भी ओनर हैं? आप बोलते हैं कि माइ माइन्ड, माइ बॉडी, माइ स्पीच तो उसकी ज़िम्मेदारी आ गई। क्या ज़िम्मेदारी है? कि ये माइन्ड, बॉडी और स्पीच ये इफेक्टिव हैं। किसी ने गाली दे दी, तो ये माइन्ड इफेक्टिव है, इसलिए माइन्ड को इफेक्ट हो जाती (पृ.३८)है। लेकिन आप बोलते हैं माइ माइन्ड, तो ये इफेक्ट आपको ही लगती है। सेल्फ को रियलाइज़ किया, फिर आपको इफेक्ट नहीं लगती। फिर आप बोलेंगे, ‘रवीन्द्र ये आपकी डाक है, हमारी डाक नहीं है।’ ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ वो रोंग बिलीफ है। अपने रियल स्वरूप को, रियली ‘मैं खुद कौन हूँ’ जान लें तो फिर राइट बिलीफ हो जाती है। वो राइट बिलीफ हो गई, फिर राइट ज्ञान हो जाता है और फिर राइट वर्तन हो जाता है, तो खुद ही ‘खुद’ हो जाता है। फिर ‘खुद’ ही ‘खुदा’ हो जाता है। जो ‘खुद’ है वो ही ‘खुदा’ हो जाता है। परमानेन्ट शांति कैसे?प्रश्नकर्ता : खुद को पहचानने के लिए, शुद्घ होने के लिए क्या साधन करना चाहिए? दादाश्री : वो पहचानने से आपको क्या फायदा होगा? प्रश्नकर्ता : शांति। दादाश्री : परमानेन्ट शांति चाहते हो? थोड़ी देर झगड़ा करना, फिर शांत हो जाना, ऐसी टेम्परेरी शांति में क्या फायदा? शांति दो प्रकार की रहती हैं। एक आदमी को घर में ठंड बहुत लगती है, तो वो धूप में चला जाता है, तो वहाँ शांति होती है और समर में धूप में बहुत गर्मी लगती है तो जब पेड़ के नीचे बैठता है, तो शांति लगती है। वो सब टेम्परेरी शांति है। आपको परमानेन्ट शांति चाहिए? प्रश्नकर्ता : हाँ, परमानेन्ट शांति ही चाहिए। दादाश्री : फिर क्या करेगा परमानेन्ट शांति को? अभी तक तो देखी ही नहीं है न? सुना भी नहीं है न? प्रश्नकर्ता : हाँ, लेकिन हर वक्त अशांति से क्या फायदा? शांति कहाँ से मिले, उसका उपाय बताइए। दादाश्री : अशांति कहाँ से लाए? उसके सामने की ही दुकान (पृ.३९)है शांति की। आपको शांति का उपाय चाहिए कि शांति चाहिए? आपको जो चाहिए है, वो देंगे। अंतर शांति मिल गई तो अंतर दाह मिट गया, और वो ही मुक्ति की सच्ची टिकिट है। वो ही मोक्ष का लाइसेन्स है। प्रश्नकर्ता : पीस ऑफ माइन्ड नहीं रहने का कॉज़ क्या है? दादाश्री : उसका जो कॉज़ है न, वो अज्ञानता है। दूसरा कोई कॉज़ नहीं है। ज्ञान से पीस ऑफ माइन्ड सदा रहती है और अपने हरेक काम होते हैं। आपको तो ऐसा लगता है न कि मैं चलाता हूँ? देट इज़ कम्प्लीट रोंग! प्रश्नकर्ता : चलाएँ या ना चलाएँ, लेकिन रिस्पॉन्सिबिलिटी (ज़िम्मेदारी) तो अपने ऊपर ही है न? दादाश्री : आपको जितनी ज़िम्मेदारी है, इससे भी ज़्यादा ज़िम्मेदारी वाला हो तो भी पीस ऑफ माइन्ड सदा रहनी चाहिए। प्रश्नकर्ता : मैं वो ही पूछना चाहता हूँ कि ये पीस ऑफ माइन्ड कैसे रहेगी? दादाश्री : पीस ऑफ माइन्ड क्यों नहीं रहती है? वो अज्ञानता से नहीं रहती है, वो रोंग बिलीफ से नहीं रहती है। राइट बिलीफ से पीस ऑफ माइन्ड रहती ही है। ये तो एक गलती हुई, उससे दूसरी गलती, तीसरी गलती, ऐसे सब गलतियाँ ही चल रही हैं। खुद में अशांति होती ही नहीं। खुद में आनंद ही है। ‘आप’ ‘रवीन्द्र’ हो गए कि अशांति हो जाती है। ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ वो कल्पित भाव है, आरोपित भाव है, ये रोंग बिलीफ है, आप खुद कौन हैं, वो जान लिया वही राइट बिलीफ है। प्रश्नकर्ता : राइट बिलीफ व्यवहार को कुछ मदद करती है? दादाश्री : हाँ, उससे आदर्श लाइफ हो जाती है। रोंग बिलीफ न हो तो उसकी लाइफ आदर्श होती है। (पृ.४०)संसार परिभ्रमण का रूट कॉज़!प्रश्नकर्ता : दादाजी, थोड़ा सा आत्मा के विषय में बताइए कि ये जगत् का रूट कॉज़ क्या है? दादाश्री : देखिए, ये संसार कहाँ से खड़ा हो गया? ये संसार का रूट कॉज़ क्या है? इसका रूट कॉज़ अज्ञान है। कौन सा अज्ञान? सांसारिक अज्ञान? नहीं, सांसारिक अज्ञान तो सभी का गया है कि, ‘मैं वकील हूँ, मैं डॉक्टर हूँ।’ वो तो गया ही है सभी का। लेकिन ‘मैं खुद कौन हूँ’ उसका ही अज्ञान है। वो अज्ञान से ही खड़ा हो गया है। ज्ञानी पुरुष की कृपा होने से एक घंटे में अज्ञान चला जाता है, नहीं तो करोड़ों जन्म हो जाएँ तो भी नहीं जाता। प्रश्नकर्ता : आदमी को बचपन से ऐसी ट्रेनिंग मिले तो ज्ञानी हो सकता है? दादाश्री : नहीं, वो ट्रेनिंग से नहीं होता। सारी दुनिया ही अज्ञान प्रदान करती है। आप छोटे थे, तब से ही अज्ञान प्रदान करती है, ‘आप’ को ‘रवीन्द्र’ नाम लगा दिया कि ये ‘रवीन्द्र’ है, ये ‘रवीन्द्र’ आया, ये दो साल का हो गया। सब लोगों ने भी ‘आप’ को ‘रवीन्द्र’ बोल दिया, आपने वो सच मान लिया। ‘ये रवीन्द्र ने किया, रवीन्द्र अभी पाँच साल का हो गया’, वो सब आपने सच मान लिया। फिर बड़े हो गए और शादी की तो सब लोग बोलने लगे कि ‘ये इसका पति है’, तो वो भी आपने सच मान लिया। फिर लड़का हो गया तो ‘ये लड़के का फादर है’ ऐसा भी आपने सच मान लिया। आपको खुद की पहचान नहीं और आपको ये सब रोंग बिलीफ हो गई। इससे सब भूल हो गई। तो सब से पहले सेल्फ को रियलाइज़ करना चाहिए। लेकिन वो कौन करायेंगे? दुनिया में कभी कोई दफे कोई ज्ञानी होते हैं। वहाँ मौका मिल गया तो सच्ची बात मालूम हो जाती है। आप खुद कौन हैं? प्रश्नकर्ता : मैं एक जीव हूँ। दादाश्री : जीव तो, जो मरता है और ज़िंदा रहता है, उसको जीव बोला जाता है। आपको अमर होने का विचार नहीं? (पृ.४१)प्रश्नकर्ता : अमर होने की बात कही, तो प्रश्न यह है कि जीते जी अमर या मरने के बाद अमर? दादाश्री : अभी तो जीते जी अमर, फिर मरने का भय नहीं लगता और आपको तो ऐसे कोई धौल (तमाचा) लगाता है न, तो ‘हम को, हम को, हम को’ करने लगेंगे। क्या ‘हम को, हम को’ बोलते हैं? ‘हम’ किसको माना है आपने? रवीन्द्र को ‘हम’ माना है? आप खुद को तो पहचानते नहीं, फिर ‘हम को, हम को’ क्या बोलते हो? ‘मैं रवीन्द्र हूँ’, वो गलत बात है। ऐसे अनादि से वो ही भूल संसार में चली आई है। खुद की पहचान करो कि, ‘आप खुद कौन हैं’। फिर खुदा हो जाएँगे। फिर भगवान आपके पास से कभी जाएँगे ही नहीं। ‘मैं रवीन्द्र हूँ’, वहाँ तक भगवान आपके पास आएँगे भी नहीं। खुद की पहचान अभी तक नहीं की? प्रश्नकर्ता : उसी का तो मैं मंथन कर रहा हूँ। दादाश्री : खुद की पहचान करने का मंथन करता है, बड़ी भारी बात है। सब लोग पैसे के लिए मंथन करते हैं और आप खुद की पहचान के लिए मंथन करते हैं। यह बड़ी तारीफ की बात है। प्रश्नकर्ता : जब तक मुझे खुद का अनुभव नहीं होगा, आत्म अनुभव नहीं होगा, तब तक मैं आगे नहीं बढ़ सकता? दादाश्री : हम एक घंटे में आपको आत्मा का अनुभव करा देंगे, फिर कभी आत्मा नहीं चला जाएगा और क्षायक समकित हो जाएगा। ‘‘एगो में शाषओ अप्पा, नाण दश्शण संजूओ, शेषा में बाहिराभावा, सव्वे संजोग लख्ख़णा। संजोग मूला जीवेण, पत्ता दु:ख परंपरा, तम्हा संजोग संबंधम्, सव्वम् तिवीहेण वोसरियामी।’’ (पृ.४२)ऐसी दशा हो जाती है। कभी हुआ नहीं था, लेकिन ये हुआ है। भगवान महावीर तक दस आश्चर्य हुए थे, ये ग्यारहवाँ आश्चर्य है। आपको ठीक लगे तो आना, नहीं तो ये तो वीतराग मार्ग है। मिथ्यात्व दृष्टि : सम्यक् दृष्टि‘मैं रवीन्द्र हूँ’ ये आपकी रोंग बिलीफ है। ‘इनका पति हूँ’ ये दूसरी रोंग बिलीफ है। ‘इनका पिता हूँ, इनका भाई हूँ’, ऐसी कितनी रोंग बिलीफें हैं? प्रश्नकर्ता : बहुत हैं। दादाश्री : आप हकीकत में क्या हैं, यह आपको मालूम नहीं है। ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ ये आपकी मिथ्यात्व दृष्टि है। ‘मैं सच्चिदानंद हूँ’ (मैं शुद्धात्मा हूँ), ये दृष्टि मिल जाए तो उसको सम्यक् दृष्टि बोला जाता है। रोंग बिलीफ को ‘मिथ्या-दर्शन’ और राइट बिलीफ को ‘सम्यक्-दर्शन’ बोला है। ये रोंग बिलीफ का रूट कॉज़ क्या है? अज्ञानता! ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ ये आपने सच मान लिया वो ही मिथ्यात्व है, वो ही रूट कॉज़ है। वो भौतिक सुख की इच्छा ही मिथ्यात्व नहीं है। हम ये आपकी रोंग बिलीफ फ्रेक्चर कर देते हैं और राइट बिलीफ बिठा देते हैं। हम आपके भौतिक सुख फ्रेक्चर नहीं कर सकते। उसको फ्रेक्चर करने की कोई ज़रूरत ही नहीं। जिसका जो खाने का विचार है, वो बोलते हैं, कि साहब, आज हम को जलेबी खाने का विचार है। तो हम बोलते हैं कि ‘खाओ, आराम से खाओ।’ हम को उससे कुछ तकलीफ नहीं है। पात्रता का प्रमाण!कभी चिंता कुछ होती है? प्रश्नकर्ता : चिंता तो रहती ही है। दादाश्री : एक साल में कितना टाइम? दो टाइम? (पृ.४३)प्रश्नकर्ता : चिंता तो रोज़ ही होती रहती है। दादाश्री : किसलिए चिंता करते हो? कुछ कम है आपके पास? प्रश्नकर्ता : भगवान की दया से सबकुछ है। दादाश्री : तो फिर चिंता क्यों करते हो? प्रश्नकर्ता : प्रोफेशन (व्यवसाय) में तो चिंता आ ही जाती है। दादाश्री : वेस्ट ऑफ टाइम ऐन्ड एनर्जी। बड़े C.A. हो गए! C.A. तो किसको बोला जाता है? जो बहुत विचारशील होते हैं, कि ये सब किससे होता है? मैं कौन हूँ? ये सब क्या है? कहाँ से आया? कैसे मैं C.A. हो गया? C.A. कौन हो गया? ये सब रियलाइज़ होना चाहिए। प्रश्नकर्ता : रियलाइज़ेशन के लिए, खुद कौन हैं, वो समझने की मेरी ताकत नहीं। दादाश्री : लेकिन आपकी इच्छा तो है न, रियलाइज़ेशन करने की? प्रश्नकर्ता : अभी तो जैसा चलता है ऐसा चलने दो। सेल्फ रियलाइज़ तो होना चाहिए लेकिन सेल्फ रियलाइज़ करने के लिए वो शक्ति और स्टेज आनी चाहिए। दादाश्री : इसमें स्टेज कैसी? आप पुनर्जन्म में मानते हैं कि नहीं मानते? प्रश्नकर्ता : मानता हूँ। दादाश्री : जो पुनर्जन्म में मानते हैं, वो स्टेज वाले बोले जाते हैं। जो पुनर्जन्म में समझते नहीं, उनके लिए स्टेज नहीं है। हमने इन सभी को सेल्फ रियलाइज़ करा दिया है, फिर कभी कुछ भी चिंता नहीं होती और धंधा-सॢवस सबकुछ करते हैं। प्रश्नकर्ता : संसार में ऐसा नहीं हो सकता है। (पृ.४४)दादाश्री : संसार के बाहर दूसरी जगह किधर है? संसार के बाहर तो कोई जगह ही नहीं है। प्रश्नकर्ता : जब तक संसार है, तो हम सेल्फ रियलाइज़ नहीं कर सकते। उसके लिए संसार से अलग होना चाहिए। दादाश्री : संसार से अलग कोई हुआ ही नहीं था। कृष्ण भगवान भी संसार में पत्नी के साथ रहते थे। ‘यू आर रवीन्द्र’, इज़ करेक्ट बाइ रिलेटिव व्यू पोइन्ट ऐन्ड हू आर यू बाइ रियल व्यू पोइन्ट? प्रश्नकर्ता : हू इज़ टु जज देट? रियल में कौन होना चाहिए? दादाश्री : वो जो रियल है न, वो समझ सकता है। जो रिलेटिव है न, वो समझ नहीं सकता और जिसने रियलाइज़ किया है, वो समझ सकता है। आप रवीन्द्र हैं, वो बात सच्ची है? वो तो आपका नाम है, आप खुद कौन हैं? प्रश्नकर्ता : नो बडी! दादाश्री : नो बडी? नो बडी ऐसा नहीं बोला जाता है। खुद तो हैं ही, लेकिन आप बोलते हैं न, ‘दिस इज़ माइ हैन्ड, दिस इज़ माइ हेड, माइ आइज़’। ऐसा आप बोलते हैं, तो बोलने वाले आप कौन हैं? ऐसी तलाश तो करनी चाहिए न? नो बडी बोल नहीं सकते। तो आप खुद कौन हैं, इसका रियलाइज़ नहीं किया है? ये घड़ी रियलाइज़ करके लाए थे? घड़ी चलती है कि नहीं चलती है? प्रश्नकर्ता : हाँ। दादाश्री : और वाइफ को रियलाइज़ किया था कि नहीं? प्रश्नकर्ता : हाँ, किया था। (पृ.४५)दादाश्री : तो आपको खुद का रियलाइज़ तो करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? आपने किया है? कौन है आप? प्रश्नकर्ता : मैं आत्मा हूँ। दादाश्री : लेकिन अनुभव है आपको? प्रश्नकर्ता : नहीं, अनुभव नहीं है। दादाश्री : तो ऐसा आप नहीं बोल सकते। अनुभव होना चाहिए। प्रश्नकर्ता : ये अनुभव ही तो मुश्किल है। दादाश्री : अनुभव कराने के लिए कितने पैसे खर्च हो जाएँ तो चलेगा? प्रश्नकर्ता : समझने में पैसों का सवाल नहीं आता। दादाश्री : नहीं आता न? तो पैसे का सवाल किसमें आता है? सिनेमा देखने में? सिनेमा देखने को तीन रुपये माँगता है न? और मूली का भी दस पैसा लेता है न? वो मूल्यवान बोली जाती है और ये अमूल्य है, इसका पैसा भी नहीं रहता (लगता)। तो भगवान कितने फायदा वाले (कृपालु) हैं? कोई परेशानी नहीं, कोई खर्च नहीं। भगवान की प्राप्ति होना बहुत सरल बात है। हम ज्ञान नहीं देते हैं, वहाँ तक आत्मा और देह जोइन्ट रहते हैं, अलग नहीं होते हैं। हम ज्ञान देते हैं, तब आत्मा और देह अलग हो जाते हैं। प्रश्नकर्ता : हम को कैसे पता लगेगा कि अलग हो गए? दादाश्री : वो आपको ख्याल में आ जाएगा कि ‘मैं शुद्घात्मा हूँ’ और वो याद नहीं करना पड़ेगा। ऐसे ही ख्याल में आ जाएगा। आपको कोई बोले कि ‘रवीन्द्र ने हमारा बुरा कर दिया है’, तो आपको कुछ पज़ल होता है क्या? (पृ.४६)प्रश्नकर्ता : पज़ल तो होगा न? दादाश्री : फिर सॉल्यूशन कैसे होता है? फिर ऐसे ही पेन्डिंग रहता है? द वल्र्ड इज़ द पज़ल इटसेल्फ, देअर आर टू व्यू पोइन्ट ऐन्ड टु सॉल्व दिस पज़ल, वन रिलेटिव व्यू पोइन्ट ऐन्ड वन रियल व्यू पोइन्ट। ये पज़ल सॉल्व हो जाए फिर आप खुद कौन हैं, वो मालूम हो जाता है। प्रश्नकर्ता : रियल व्यू पोइन्ट और रिलेटिव व्यू पोइन्ट क्या हैं? दादाश्री : ऑल दीज़ रिलेटिव्स आर टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट ऐन्ड रियल इज़ द परमानेन्ट। प्रश्नकर्ता : बट व्हाट आर दीज़ एडजस्टमेन्ट्स? दादाश्री : ये आपका जो शरीर है, ये हाथ हैं, ये सब एडजस्टमेन्ट हैं, वो सब रिलेटिव हैं। बाइ रिलेटिव व्यू पोइन्ट यू आर रवीन्द्र ऐन्ड बाइ रियल व्यू पोइन्ट आप क्या हैं, वो ही समझने की ज़रूरत है। यू आर रवीन्द्र इज़ करेक्ट बाइ रिलेटिव व्यू पोइन्ट ऐन्ड बाइ रियल व्यू पोइन्ट यू आर प्योर सोल (शुद्धात्मा)। लेकिन आपको रियलाइज़ नहीं हुआ, वहाँ तक आप कैसे शुद्घात्मा हो जाएँगे? वहाँ तक रवीन्द्र की डाक आप ले लेंगे। ये ‘अशोक’ है लेकिन वो ‘अशोक’ की डाक अलग है और उनकी खुद की पोस्ट अलग है। आपको कोई रवीन्द्र के नाम की गाली दे तो आप वो डाक ले लेते हैं, क्योंकि आप रवीन्द्र को ही पहचानते हैं, कि मैं रवीन्द्र हूँ। रियल व्यू पोइन्ट ऐन्ड रिलेटिव व्यू पोइन्ट समझ जाएँ तो दुनिया में कोई बाधा नहीं आएगी। ऐसा महावीर भगवान का विज्ञान है, चौबीस तीर्थंकरों का विज्ञान है! आपको कुछ भी छोड़ने का नहीं है। बात ही समझने की है कि ये डाक इसकी है और ये डाक मेरी है। (पृ.४७)आपके अंदर है, वो खुद ही परमात्मा है। वो परमात्मा आपकी समझ में आ जाए, तो फिर आप भी परमात्मा हो जाते हैं। जहाँ तक आप रवीन्द्र हैं, वहाँ तक वो समझ में नहीं आएगा। अभी तो आपको ‘मैं रवीन्द्र हूँ’ वो ही एक्सपिरियन्स हुआ है। जब ‘मैं शुद्घात्मा हूँ’ वो एक्सपिरियन्स हो जाए तो, सब काम पूरा हो गया। आप रवीन्द्र नहीं हैं। जो आप नहीं हैं, लेकिन वहाँ आप बोलते हैं कि, ‘मैं रवीन्द्र हूँ’, वो आरोपित भाव है, कल्पित भाव है। प्रश्नकर्ता : आप कहते हैं कि हम में और आप में कुछ फर्क नहीं है। दादाश्री : कोई फर्क नहीं है। मैं खुद को पहचानता हूँ और आप खुद को पहचानते नहीं है, यही फर्क है। दूसरा कोई फर्क नहीं है। प्रश्नकर्ता : मैं तो खुद को पहचानता हूँ। दादाश्री : नहीं, आप खुद को नहीं पहचानते। आप तो बोलते हैं कि, ‘मैं रवीन्द्र हूँ’। वो तो रोंग बिलीफ है। रवीन्द्र इज़ करेक्ट बाइ रिलेटिव व्यू पोइन्ट। यू आर ब्रदर ऑफ यॉर सिस्टर इज़ करेक्ट बाइ रिलेटिव व्यू पोइन्ट, नॉट बाइ फैक्ट। प्रश्नकर्ता : क्यों? दिस इज़ अ फैक्ट बिकॉज़ आइ एम बॉर्न टु द सेम मदर! दादाश्री : बट इट इज़ करेक्ट बाइ रिलेटिव व्यू पोइन्ट, नोट बाइ रियल व्यू पोइन्ट! ऐन्ड दिस इज़ ओन्ली टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट! यू आर परमानेन्ट। लेकिन वो आपको मालूम नहीं। आप बोलेंगे कि ‘मैं रवीन्द्र हूँ, अभी जवान हूँ।’ फिर वृद्घ हो जाएँगे, क्योंकि रवीन्द्र टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट है। दो लैंग्वेज हैं। एक रिलेटिव लैंग्वेज है, एक रियल लैंग्वेज है। रियल लैंग्वेज ‘ज्ञानी पुरुष’ सारी दुनिया में अकेले ही जानते हैं। सब लोग रिलेटिव लैंग्वेज जानते हैं। रिलेटिव लैंग्वेज इज़ टेम्परेरी एडजस्टमेन्ट ऐन्ड रियल लैंग्वेज इज़ परमानेन्ट एडजस्टमेन्ट! (पृ.४८)रिलेटिव लैंग्वेज में दुनिया के लोग क्या बोलते हैं, ‘गॉड इज़ द क्रिएटर ऑफ दिस वल्र्ड’ और ऐसा ही सारा जगत् मानता है। लेकिन वो रिलेटिव करेक्ट है, रियल करेक्ट बात नहीं है। सभी अपने व्यू पोइन्ट से सच्चे हैं, नॉट बाइ फैक्ट। व्यू पोइन्ट, वह फैक्ट नहीं है। बाइ रियल लैंग्वेज, द वल्र्ड इज़ द पज़ल इटसेल्फ! वह रियल करेक्ट है। रियल करेक्ट जानो तो मोक्ष मिलता है। तो रियलाइज़ किसका करने का? रियल का रियलाइज़ करने का! रिलेटिव को रियलाइज़ करने में कोई फायदा नहीं है। प्रश्नकर्ता : असली ज्ञान तो रियल का ही है न? दादाश्री : हाँ, दरअसल तो है। लेकिन वो चार अरब की बस्ती में ‘ज्ञानी पुरुष’ अकेले ही जानते हैं। दूसरा कोई आदमी जान सकता ही नहीं। पुस्तक में ऐसी बात लिख नहीं सकते, क्योंकि वो बात अवर्णनीय है, अव्यक्तव्य है। आत्मा जो है, उसका वर्णन हो सके ऐसा नहीं है। द वल्र्ड इज़ द पज़ल इटसेल्फ। ये पज़ल जो सॉल्व करे, उसको परमात्मा पद की डिग्री मिलती है। हम ये पज़ल सॉल्व करके बैठे हैं। जिसका पज़ल सॉल्व हो गया है, वो सब का पज़ल सॉल्व करा सकते हैं। जिसका पज़ल सॉल्व नहीं हुआ, वो सब ये पज़ल में डिज़ोल्व हो गए हैं। पज़ल सॉल्व कर दिया कि सारे ब्रह्मांड के ऊपर बैठ गया। द वल्र्ड इज़ द पज़ल इटसेल्फ, ये पहली दफे ऐसा वाक्य निकल गया है, ऐसा कोई बोला ही नहीं। नया ही वाक्य, नई ही बात, नया ही साइन्स है। ये बेसमेन्ट ही नया है। किसी दिन जगत् जब ये बात सुनेगा, तब सब लोग आफ़रीन हो जाएँगे। प्रश्नकर्ता : वो रियल ज्ञान कैसे प्राप्त करना है? दादाश्री : ‘ज्ञानी पुरुष’ हैं, उनके पास जाकर आपको बोलने का कि ‘हम को रियल का रियलाइज़ करा दो’, तो वो करा देंगे। प्रश्नकर्ता : करा देंगे? (पृ.४९)दादाश्री : हाँ, सबकुछ कर सकते हैं। प्रश्नकर्ता : तुरंत करा देगें? दादाश्री : हाँ, तुरंत, तुरंत! छ: महीने नहीं लगते, दो दिन भी नहीं लगते। जैसे वो ऑपरेशन के लिए छ: घंटे बैठना पड़ता है, इधर तो एक घंटे में ऑपरेशन कर देते हैं, विदिन वन आवर ओन्ली! हम सभी लोगों को ज्ञान दे सकते हैं; जैन हो, वैष्णव हो, मुस्लिम हो, पारसी हो या कोई भी हो। प्रश्नकर्ता : वहाँ भी तो कोई अंतर नहीं है। दादाश्री : हाँ, उधर तो कोई मतभेद ही नहीं होता है। सब मतभेद रिलेटिव के अंदर है, रियल के अंदर कोई मतभेद नहीं है। एक दफे रियल का रियलाइज़ हो गया फिर मुक्ति हो गई। प्रश्नकर्ता : रियल को रियलाइज़ करना कोई आसान बात थोड़ी है? दादाश्री : वो (रियलाइज़ेशन) कभी होता ही नहीं। कभी ‘ज्ञानी पुरुष’ मिल जाते हैं, तो उनके पास होता है। ‘ज्ञानी पुरुष’ प्रत्यक्ष मिलें और उनकी कृपा से मिल जाता है। ‘ज्ञानी पुरुष’ में भगवान प्रकट हो गए हैं, चौदह लोक के नाथ प्रकट हो गए हैं। लेकिन हम तो निमित्त हैं, हम कर्ता नहीं हैं। निमित्त से सबकुछ काम होता है। प्रश्नकर्ता : आप बताते हैं कि आप निमित्त हैं, लेकिन आपकी ही वजह से हमारा सब का काम हो जाता है। दादाश्री : वो बात ठीक है। मेरी समझ से तो मैं निमित्त हूँ, लेकिन आप सभी को मुझे निमित्त नहीं मानना चाहिए। आप निमित्त मानेंगे, तो आपका काम पूरा नहीं होगा। आत्मज्ञान प्राप्ति कैसे?आत्मा को समझो फिर दु:ख कहीं भी नहीं है। आत्मा आपकी समझ में आ जाए, दर्शन में आ जाए, फिर काम पूर्ण हो गया। इतना (पृ.५०)ही समझने का है। बड़े शास्त्र में भी वो ही लिखते हैं, कि आत्मा जानने का है। दूसरा क्या लिखते हैं? वो ही बात समझने की है, कोई भी रास्ते भगवान को पकड़ लो! सब साधु-सन्यासी भगवान की ही खोज करते हैं, लेकिन उनके हाथ में मिकेनिकल आत्मा आया है। ये फिज़िकल शरीर है, उसके अंदर मिकेनिकल आत्मा है। वो मिकेनिकल आत्मा को ‘आत्मा’ मानते हैं। वो ठीक बात नहीं है, पूरी बात नहीं है। आत्मा तो अचल है, अविचल है। यह सेल्फ का रियलाइज़ कभी हुआ ही नहीं और जो सेल्फ रियलाइज़ किया है, वो रोंग किया है। सच्चा रियलाइज़ किया हो, तो फिर परमात्मा हो जाता है। ये शरीर जो दिखता है न, वो चेतन नहीं है। चेतन चेतन ही है। ये शरीर जो सारे दिन धंधा करता है, पानी पीता है, शादी करता है, संसार में जो कुछ करता है, वो सब में चेतन कुछ भी नहीं करता है। उसमें चेतन है ही नहीं। वो जो करता है, वो सिर्फ ड्रामेटिक पुतला है, दूसरा कुछ नहीं है और उसको ही मानता है कि, ‘मैं हूँ, मैं हूँ’, वो ही माया है। दूसरी कोई माया नहीं है। जिधर खुद नहीं हैं, वहाँ ‘मैं हूँ’ बोलते हैं और जिधर हैं, उधर कुछ ख़बर नहीं, मालूम ही नहीं है। आत्मा प्राप्त करने के लिए लोग बाहर भटकते हैं। लेकिन वो कैसे मिले? जिसको आत्मा मिला है उनके पास जाओ, तो वो आपका आत्मा जो अंदर है, उसे खुला (प्रकट) कर देते हैं। हम हमारा कुछ देते नहीं है, (आपका ही) आपको लेने का है। लेकिन आपको ख्याल में नहीं है कि किधर है, वो हम बता देते हैं। खुद कौन हैं, ऐसे खुद के स्वरूप का भान नहीं हुआ है, वहाँ तक ‘मैं करता हूँ’ वो भान नहीं जाता। ये जगत् में विकट में विकट कुछ है, तो वो आत्मा जानने की बात बहुत विकट है। आत्मा के लिए सब लोगों ने अलग-अलग कल्पना की है। आत्मा कल्पित नहीं है। आत्मा कल्पना स्वरूप नहीं है। जैनों ने अलग कल्पना की है, वेदांत ने भी अलग कल्पना की है। वेदांत ने तो बोल दिया कि ‘दिस इज़ नोट देट, दिस इज़ नोट देट!’ आत्मा जानना है, तो वो इसमें (वेद में) नहीं (पृ.५१)है, गो टु ‘ज्ञानी’। ‘ज्ञानी’ के पास आत्मा है। दूसरी कोई जगह पर आत्मा नहीं हो सकता। आत्मा तो सब जगह पर है, लेकिन आत्मज्ञान नहीं है। आत्मा क्या चीज़ है? आत्मा वो ही परमात्मा है, वो ही (आप) खुद हैं। आत्मा जान लो तो दूसरा कुछ जानने का नहीं रहता है। आत्मा अलख निरंजन है, उसका लक्ष्य बैठ गया कि सब काम पूरे हो गए। ये शरीर अपना नहीं है, मन अपना नहीं है, ये वाणी भी अपनी नहीं है। और जो अपना नहीं है, उसको ‘मेरा है, मेरा है’ करता है, इससे कर्म बंधन होता है, इससे संसार चालू रहता है। बुरा करता है तो बुरे फल भुगतने पडते हैं। उससे अच्छा करना वो अच्छी चीज़ है। लेकिन अच्छा करना वो भी भ्रांति है। उससे अच्छा फल मिलेगा लेकिन मुक्ति नहीं मिलेगी। आत्मा क्या है? वो तो क्षेत्रज्ञ है। क्षेत्रज्ञ यानी क्षेत्र को जानने वाला है। दूसरा कुछ करने वाला नहीं है। सब क्षेत्र को जानने वाला, सभी चीज़ों को जानने वाला है। लेकिन पहले आत्मा का भान होना चाहिए। एक बार आत्मा का भान हो गया तो फिर आगे सबकुछ हो सकता है। आत्मा क्या चीज़ है, वो कभी स्पष्ट नहीं हुआ। जब ‘ज्ञानी’ होते हैं, तभी सब चीज़ स्पष्ट होती है। सारी दुनिया के पज़ल सॉल्व हो जाते हैं। आत्म अनुभव : ज्ञान से या विज्ञान से?प्रश्नकर्ता : ज्ञान क्या चीज़ है? दादाश्री : ज्ञान दो प्रकार के रहते हैं। एक ज्ञान, जो कुछ नहीं कर सकता है, वो शब्दज्ञान है। शास्त्र के अंदर, पुस्तक के अंदर, वेदांत के अंदर जो ज्ञान है, उसे जान लिया, लेकिन वो ज्ञान क्रियाकारी नहीं है, और दूसरा ज्ञान है, वो ज्ञान ही काम करता है। अपना ‘खुद’ का ज्ञान जान लिया, वो क्रियाकारी ज्ञान है। (पृ.५२)प्रश्नकर्ता : क्षर ज्ञान ऊँचा है या अक्षर ज्ञान? दादाश्री : क्षर ज्ञान तो ये डॉक्टर के पास है, वकील के पास है, वो तो सब के पास है। तो अक्षर ज्ञान इनसे बड़ा है और इनसे भी बड़ा अन्-अक्षर ज्ञान है। हम जो ज्ञान देते हैं, वो अन्-अक्षर ज्ञान है। प्रश्नकर्ता : लेकिन अन्-अक्षर तो नेगेटिव हुआ न? दादाश्री : नहीं, अन्-अक्षर यानी जहाँ शब्द भी नहीं है। नि:शब्द। अक्षर यानी शब्द, अक्षर जितना है वो शब्द से परमानेन्ट है और वहाँ तो शब्द से परमानेन्ट नहीं चलेगा। ये ‘शक्कर मीठी है’ वो शब्द से परमानेन्ट है, लेकिन वो बोलने से अपने को मीठा स्वाद आएगा? अक्षर ऐसा है। और ‘ज्ञानी पुरुष’ मीठी यानी क्या, वह टेस्ट करा देते हैं। इधर आध्यात्मिक विज्ञान है। आध्यात्मिक विज्ञान पुस्तक में नहीं मिलता है। वो पुस्तक में होता ही नहीं (वो अनुभव से मालूम होता है)। पुस्तक में तो आध्यात्मिक ज्ञान होता है। प्रश्नकर्ता : ज्ञान और विज्ञान में फर्क क्या है? दादाश्री : ये जो आम है, वो कैसा लगता है? मीठा लगता है न? तो ‘आम मीठा है।’ ऐसा ज्ञान पुस्तक से होता है। लेकिन मीठा क्या है? वो पुस्तक में नहीं होता है, वो विज्ञान है। ‘मीठा है’, वो क्या चीज़ है, ये मीठा कैसा है, वो पुस्तक में नहीं होता, आपको अनुभव से मालूम होता है, वो अध्यात्म विज्ञान बोला जाता है। ड्रामा कभी सच हो सकता है?दुनिया में इतनी ही बातें हैं - वांधा (विरोध), वचका (दखल) और अज्ञान मान्यता। ‘मैं रवीन्द्र हूँ, मैं इनका फादर हूँ’, ये सब बोलते हैं न, वो अज्ञान मान्यता है, रोंग बिलीफ है। राइट बिलीफ होनी चाहिए। प्रश्नकर्ता : लेकिन अभी तो सब अज्ञान में ही घूम रहे हैं, ये मेरा है, ये तेरा है, यही चल रहा है। (पृ.५३)दादाश्री : वो ठीक बात है लेकिन आप जैसा बोलते हैं, वो तो व्यवहार के लिए बोलने का है, सचमुच नहीं बोलने का है। तो आप तो सचमुच बोलते हैं। इनका नाम पूछेंगे तो वो बोलेंगे कि ‘अशोक’, लेकिन वो अंदर खुद समझता है कि, ‘व्यवहार चलाने के लिए मेरा नाम है, मैं खुद ये नहीं हूँ।’ वो ड्रामेटिक रहता है और आप तो सच में ही करते हैं। जैसा ड्रामा में भर्तृहरि राजा है, तो वो, ‘हम भर्तृहरि राजा हैं, ये मेरा राज है, ये मेरी रानी है।’ ऐसा बात करेगा और फिर ‘भिक्षा दे मैया पिंगला’ ऐसा भी बोलता है, रोता है। तो सब लोगों को दु:ख होता है, कि ओहोहो, ये कितना दु:खी हो गया। उसको ख़ानगी में जाके (व्यक्तिगत रूप से) पूछेंगे तो वो बोलेगा कि, ‘नहीं भई, हम को कुछ दु:ख नहीं है, ये तो हम को भर्तृहरि का अभिनय करना पड़ता है। अभिनय नहीं करेगा तो पगार में से पैसा काट लेगा। ‘मैं भर्तृहरि नहीं, मैं तो लक्ष्मीचंद हूँ।’ तो क्या वो ‘मैं लक्ष्मीचंद हूँ’ ऐसा कभी भूल जाता है? प्रश्नकर्ता : नहीं भूलेगा। दादाश्री : और आप खुद कौन हैं, वो भूल गए हैं। पहले मैं खुद कौन हूँ, वो जानना चाहिए, फिर ड्रामेटिक रहना चाहिए। व्यवहार का निरीक्षक-परीक्षक कौन?दादाश्री : आप कौन हैं? प्रश्नकर्ता : आत्मा। दादाश्री : हाँ, बराबर है। अभी कोई आदमी आपको गाली दे तो आपको इफेक्ट होती है? प्रश्नकर्ता : व्यवहार में होती है। दादाश्री : तो आप आत्मा नहीं हैं, आप रवीन्द्र हो गए। जो आत्मा है, तो उसको गाली नहीं लगती। पुद्गल की डाक आत्मा लेने वाला नहीं है। आत्मा की डाक पुद्गल लेने वाला नहीं। दोनों की (पृ.५४)डाक अलग है। हम को कोई गाली दे, कुछ भी करे, तो वो हम नहीं हैं। वो पुद्गल है, उसका नाम ए. एम. पटेल है। ये ए. एम. पटेल के साथ हमारा छब्बीस साल से क्या संबंध है? वो हमारा पहला पड़ोसी हो ऐसा। और उसका मालिक मैं नहीं हूँ, मेरा मालिक ये पुद्गल नहीं है, हम दोनों पड़ोसी हैं। ये बोलता है, वह कौन है? ये ओरिजिनल टेपरिकॉर्ड है। हम इस वाणी के छब्बीस साल से मालिक नहीं हैं। हम खुद में ही रहते हैं, होम डिपार्टमेन्ट में ही रहते है। फॉरेन डिपार्टमेन्ट में जाते ही नहीं। फॉरेन की बात चल रही हो, वो सब हम देख रहे हो व्यवहार में सब फॉरेन ही है। प्रश्नकर्ता : व्यवहार में सब फॉरेन कैसे है? दादाश्री : वो सब फॉरेन ही है। आप फॉरेन को होम मानते हैं। लेकिन वो तो फॉरेन है, तो होम का काम कब होगा? हम तो होम में रहते हैं और फॉरेन का भी काम करते हैं। अभी फॉरेन का काम चल रहा है, इस पर हम देख-भाल रखते हैं। निरीक्षक रहते हैं और परीक्षक भी रहते हैं। ये टेपरिकॉर्ड क्या बोल रही है, उसके हम परीक्षक भी हैं। हम जुदा, ये जुदा। महत्वता, भौतिक ज्ञान की या स्वरूप ज्ञान की?प्रश्नकर्ता : मुझे न्यूरोलॉजी, एस्ट्रोलॉजी का ज्ञान थोड़े समय में खुलने वाला है, ऐसा मुझे लगता है। दादाश्री : न्यूरोलॉजी, एस्ट्रोलॉजी वो सब सब्जेक्ट हैं, वो प्रकाश नहीं है। प्रकाश तो ये है कि, ‘मैं खुद आत्मा हूँ, शुद्घात्मा हूँ’ और इससे प्रकाश हो जाता है। उस प्रकाश से सब देख सकते हैं। आत्मा का (केवल) ज्ञान खुल (प्रकट हो) जाए तो सब ज्ञान खुल जाते हैं। आत्मा का ज्ञान वो ही ज्ञान है, वो ही प्रकाश है, जिससे सब प्रकाश हो जाता है। हम देखकर बोलते हैं, पुस्तक में पढ़कर नहीं बोलते हैं। हम (पृ.५५)को लोग पूछते हैं कि, आप कहाँ से (पढकर) बोलते हैं। मैंने कहा कि मैं देखकर बोलता हूँ। ये बात, इधर का एक शब्द भी पुस्तक में से पढ़ा हुआ नहीं है। ये ‘अक्रम विज्ञान’ है। दुनिया में दस लाख साल में एक दफे होता है। नहीं तो, ऐसा अक्रम तो होता ही नहीं। इसमें तप-त्याग कुछ करने का नहीं। ‘अक्रम ज्ञानी’ के पास आ गया, उसका सब काम पूरा हो गया। आप जिसको ज्ञान कहते हैं, वो लाइट सच्ची लाइट नहीं गिनी जाती है। सच्ची लाइट हो जाती है, तो उस पर सब को आकर्षण हो जाता है और कायम की अंतर शांति भी हो जाती है। इसलिए पहले आत्मा का ही ज्ञान जानना। दूसरा सब जानते हैं वो ठीक बात है, पर पहले ये लाइट हो गई तो सभी (प्रकार के ज्ञान प्राप्ति की) तैयारी हो जाती है। तुम्हारे को जो जानने का था, वो सब ज्ञान अभी खुला (प्रकट) हो जाएगा। लेकिन सच्चा जानने का क्या था? अपना खुद का स्वरूप, वो ही प्रकाश है और दुनिया में उस प्रकाश से ही सब दिखता है और प्रकाश के बिना जो देखा, वो बुद्घि से देखा है। प्रकाश से देखी हुई बात सच्ची है। बुद्घि से देखी हुई बात सच्ची नहीं है। जिसकी बुद्घि बढ़ गई हो वो बुद्घू हो जाता है। फिर एकदम बुद्घू की तरह फिरता है। इसलिए बुद्घि का बहुत फायदा नहीं है। हमने बुद्घि छोड़ दी, हम अबुध हैं। हम को बुद्घि इतनी भी नहीं है, हम तो ‘ज्ञानी’ हैं। बुद्घि से क्या होता है? इमोशनल होते हैं। फिर इमोशन आदमी बुद्घू हो जाता है। बुद्घि संसार के बाहर निकलने नहीं देती। बुद्घि तो क्या बताती है? मुनाफा और घाटा। ज्ञान प्रकाश ही सच्ची बात है। हमने आपको जो ज्ञान प्रकाश दिया है, उससे आपको दूसरा सब ज्ञान हाथ में आ जाएगा और वो सब पूरा हो जाएगा। हिन्दुस्तान में सभी प्रकार की विद्या है, ज्ञान नहीं है। कितने प्रकार की विद्या है और कितने प्रकार की अविद्या है, लेकिन वो ज्ञान नहीं है। प्रश्नकर्ता : ज्ञान तो विद्या-अविद्या से आगे की बात है न? दादाश्री : विद्या-अविद्या वो अहंकारी ज्ञान है और आत्मज्ञान (पृ.५६)तो निर्अहंकारी ज्ञान है। जहाँ तक अहंकारी ज्ञान है, वो विद्या है। आपको कुछ भी अहंकारी ज्ञान है, वो सब विद्या है और निर्अहंकारी ज्ञान तो ज्ञान है। उसका भेद तो समझना चाहिए कि ज्ञान क्या चीज़ है, विद्या क्या चीज़ है, अविद्या क्या चीज़ है? अविद्या से दु:ख होता है और विद्या से सुख होता है और ज्ञान से हम ‘खुद’ ही होते हैं। ज्ञान-अज्ञान का भेद!प्रश्नकर्ता : ज्ञान एक है कि अलग-अलग है? दादाश्री : सभी जीवों के अंदर ज्ञान है, वो ज्ञान एक ही है। लेकिन निकलता सूर्य है, वो भी सूर्य है और डूबता सूर्य है, वो भी सूर्य है। वो सूर्य तो एक ही है, ऐसे ही ज्ञान भी एक ही है। धर्म का ज्ञान है और अधर्म का भी ज्ञान है, लेकिन ज्ञान एक ही है। धर्म और अधर्म तो आपको लगता है, हमें ऐसा नहीं लगता। हम तो एक ही, ज्ञान ही देखते हैं। आपको तो द्वंद्व है न? प्रश्नकर्ता : जो सत्मार्ग पर चलता है, उसको ज्ञान कहते हैं और जो कुमार्ग में चलता है, उसको अज्ञान कहते हैं। अज्ञान यानी इनके पास ज्ञान नहीं है। दादाश्री : ऐसा भगवान ने नहीं बोला है। ज्ञान-अज्ञान का भेद किया है, वो कहाँ तक भेद है, उसको मैं बता दूँ। जो धर्म जानता है, अच्छे काम करता है वो भी ज्ञान है और जो बुरे काम करता है, वो भी ज्ञान है, लेकिन दोनों ‘अज्ञान’ ही हैं। आत्मा जान लिया, खुद को जान लिया, वो ज्ञान ही ‘ज्ञान’ है। ये ज्ञान-अज्ञान का भेद मैंने बताया। लेकिन अज्ञान ये भी ज्ञान है। प्रश्नकर्ता : जब अज्ञान ही रहे तो आत्मा क्या जानेगा? दादाश्री : नहीं, ‘अज्ञान’ कोई खराब चीज़ नहीं है, वो भी ज्ञान है। जैसे डूबता सूर्य है और निकलता सूर्य है, वो सूर्य ही है। आत्मा का स्वरूप जाना, वो ही ‘ज्ञान’ बोला जाता है। आत्मा का स्वरूप नहीं जाना, लेकिन बाकी सब चीज़ जाना तो फिर वो ‘अज्ञान’ बोला जाता है। आत्मा के अलावा सब चीज़ जाने तो वो ‘अज्ञान’ (पृ.५७)बोला जाता है। ऐसे इसका भेद बताया है, लेकिन जानपना (स्वयं को जानना) वो ज्ञान ही है और वो ही आत्मा है। ज्ञान है, वो ही आत्मा है, दूसरा कोई आत्मा नहीं। आत्मा ऐसे हाथ में पकड़ा जाए ऐसी चीज़ नहीं है। वो तो आकाश जैसा है। आकाश जैसा सूक्ष्म है। क्या आप ‘अपने’ धर्म में हो?प्रश्नकर्ता : मनुष्य भव का लक्ष्य तो आत्म साक्षात्कार ही है न? दादाश्री : हाँ, आत्म साक्षात्कार के लिए ही ये मनुष्य देह मिली है और वो भारत में ही होना चाहिए, दूसरी जगह पर नहीं। भारत के अलावा दूसरे सभी देशों के लोग पुनर्जन्म भी नहीं समझते हैं। भारत देश में पुनर्जन्म खुद तो समझ जाते हैं, लेकिन दूसरों को नहीं समझा सकते हैं कि पुनर्जन्म है। प्रश्नकर्ता : गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि, मुझे तत्त्व रूप से जो कोई जाने-समझे तो फिर उसका पुनर्जन्म नहीं होता। दादाश्री : हाँ, वो क्या बोलते हैं कि ‘मेरे को तत्त्व से जो जानता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता है।’ तत्त्व को जानने से सब वीकनेस चली जाती है, क्रोध-मान-माया-लोभ सब चले जाते हैं। गीता आपने पढ़ी है? उसमें बताया है न कि, ‘‘सर्वधर्मान् परित्यज्य, माम् एकम् शरणम् व्रज।’’ वो कौन से धर्म को परित्यज्य बोलते हैं? प्रश्नकर्ता : दुनिया में जो सब धर्म हैं वो सभी को। दादाश्री : वो कौन से, कौन से धर्म हैं? प्रश्नकर्ता : क्रिश्चियन, इस्लाम, हिन्दू आदि वो सभी धर्म। दादाश्री : और कौन से? प्रश्नकर्ता : और मानवधर्म को भी धर्म बोलते हैं, वो सब को छोड़ के मेरी शरण में आ जा। (पृ.५८)दादाश्री : वो ऐसा नहीं बोलते हैं। वो क्या बोलते हैं? यह कान है, उसका धर्म क्या है? प्रश्नकर्ता : सुनने का। दादाश्री : सुनने का कान का ही धर्म है कि आपका खुद का धर्म है? प्रश्नकर्ता : कान का धर्म है। दादाश्री : और देखने का? प्रश्नकर्ता : आँख का। दादाश्री : और सूंघने का? प्रश्नकर्ता : नाक का। दादाश्री : और स्पर्श का? प्रश्नकर्ता : त्वचा का। दादाश्री : ये जो ज्ञान है सुनने का, वो कान का धर्म है। उसको ‘आत्मा’ क्या बोलता है कि, ‘हम सुनते हैं।’ इसमें ‘असल आत्मा (मूल आत्मा)’ नहीं बोलता है, लेकिन जो अज्ञानता है न, ‘अज्ञान आत्मा’ वो क्या बोलता है कि ‘हम सुनते हैं, हम देखते हैं, हम खाते हैं, ऐसा हम, हम करता है।’ जो कान का धर्म है, वो आपका धर्म नहीं है। उस पर आरोप मत करो। आप खुद के धर्म में आ जाओ। फिर माइन्ड का धर्म क्या है? माइन्ड का सिर्फ विचार करने का, सोचने का ही धर्म है और बोलता है कि, ‘मैंने विचार किया।’ बुद्घि का धर्म क्या है? डिसिज़न लेने का है। कोई भी चीज़ आई तो उसका डिसिज़न करने का तो बुद्घि का धर्म है। लेकिन सब लोग बोलते हैं कि, ‘ये डिसिज़न मैंने लिया।’ चित्त का धर्म क्या है? चित्त का धर्म फिरने का है। माइन्ड तो शरीर के बाहर कभी निकलता नहीं। चित्त ही बाहर निकलता है और (पृ.५९)चित्त वहाँ ऑफिस में जाकर टेबल-टेलीफोन सब देख सकता है, देखकर वापस आता है। और इगोइज़म का धर्म क्या है? आप कुछ करेंगे न, वो सब इगोइज़म का धर्म है, लेकिन वो ‘आत्मा’ बोलता है कि, ‘ये मैंने किया।’ ऐसा ये पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय हैं और मन-बुद्घि-चित्त और अहंकार, वो सब अपने धर्म में ही हैं। वो सब धर्म को ‘आत्मा’ बोलता है कि, ‘ये सब मेरा ही धर्म है।’ इसलिए ‘सर्व धर्म परित्यज्य और आप अपने खुद के धर्म में आ जाइए’ ऐसा बोलते हैं। लेकिन खुद का धर्म कहाँ से (प्राप्त) करेगा? वो आत्मज्ञान बिना नहीं हो सकता और आत्मज्ञान ‘आत्मज्ञानी’ के बिना नहीं हो सकता। आत्मज्ञान होना चाहिए ऐसा सब जानते हैं, लेकिन ‘आत्मज्ञानी’ के बिना फिर क्या करेंगे? तो सेल्फ रियलाइज़ेशन कर लिया तो फिर आत्मा आत्मधर्म में आ गया। बाकी तो, वो सब अपने धर्म में ही हैं। संसार में मोक्ष!प्रश्नकर्ता : मोक्ष को हमने उच्च कोटि का ही माना है न? दादाश्री : उच्च कोटि का नहीं, वो ही लास्ट कोटि का है, वो ही अपना धर्म है। अपना खुद का स्वरूप ही मोक्ष है। प्रश्नकर्ता : मोक्ष के लिए सब लोग प्रयत्न कर रहे हैं तो मोक्ष में आखिर क्या सुख है? दादाश्री : बंधन का स्वरूप तो मालूम होता है, वो बंधन में जब भी उसको रोग होता है, धंधे में घाटा होता है, नुकसान आता है, तब उसको बहुत परेशानी हो जाती है। और धंधे में कभी पैसा मिलता है, तो उसको आनंद होता है। सुख और दु:ख दोनों कल्पित हैं। सच्चा सुख नहीं है। जो काम करने की इच्छा नहीं है, जो काम नहीं करने के हैं, वो काम भी करने पड़ते हैं। कभी बॉस कुछ बोल देता है तो भी दिक्कत हो जाती है। कभी फौजदार मिले, दूसरा कोई मिले तो दिक्कत हो जाती है। तो वो फौजदार का अपने को बंधन लगता है। (पृ.६०)ऐसे गवर्नमेन्ट का बंधन लगता है, इन्कम टैक्स का बंधन लगता है, घर का, औरत का, सब का। जब दिक्कत होती है, तब बंधन लगता है। आपको ये बंधन लगता है कि नहीं? ये बंधन है ऐसी भी जागृति नहीं है सब लोग को?! ये बंधन है ऐसी जागृति खुद को होनी चाहिए। और मोक्ष यानी मुक्ति। संसार के बंधन में रहकर भी मुक्ति लगनी चाहिए। प्रश्नकर्ता : मोक्ष यानी क्या? दादाश्री : दो प्रकार के मोक्ष हैं। एक, सिद्घगति का मोक्ष है। वहाँ पुद्गल नहीं है। वो सच्चा मोक्ष है, बिल्कुल सच्चा मोक्ष है, 100% करेक्ट। दूसरा, इधर शरीर के साथ मोक्ष रहता है वो। इसमें भी दो प्रकार के मोक्ष होते हैं। ये ‘ज्ञान’ लिया फिर पहला मोक्ष हो गया, संसारी दु:खों का अभाव। कोई भी दु:ख नहीं। कोई गाली दे, कोई मारे तो भी दु:ख नहीं होता है और फिर इससे आगे स्वाभाविक सुख का सद्भाव होता है, वो जो हम को हुआ है। प्रश्नकर्ता : दु:ख का अभाव होगा, तो फिर सुख का सद्भाव तो आएगा ही। दादाश्री : सुख का सद्भाव तो बहुत समय के बाद आएगा। हम को आ गया है। ये सब ‘महात्माओं’ को नहीं आया। लेकिन ये सब को दु:ख का अभाव हो गया है। जगत् क्या माँगता है? हम को दु:ख न हो। बस, दूसरा कुछ नहीं। इस ज्ञान से पहले संसारी दु:ख ही नहीं रहते, ऐसा हो जाता है। स्वाभाविक सुख का सद्भाव तो ज्ञानी पुरुष अकेले को ही रहता है। प्रश्नकर्ता : वो कैसे हो सकता है? दादाश्री : ये विज्ञान है। वीतराग विज्ञान है!!! चौबीस तीर्थंकरों का विज्ञान तो इतना बड़ा भारी है। अभी दुनिया ने तो वीतराग विज्ञान का एक अंश भी नहीं देखा। प्रश्नकर्ता : मोक्ष का आनंद कैसा होता है? कैसे कह सकते हैं कि यह मोक्ष का आनंद है? (पृ.६१)दादाश्री : वो आनंद अपने को पूरा कब मालूम होता है कि जब बाहर से बहुत उपसर्ग आए या तो बहुत बड़ी दिक्कत आई उस समय ज्ञान में रहे, वो दु:ख होने का समय था, लेकिन उस समय दु:ख नहीं होता है और अंदर से आनंद होता है, तो वो आत्मा का आनंद है। अभी सत्संग में बातचीत करते हैं और भौतिक कोई चीज़ नहीं है तो ये जो आनंद है, वो भी आत्मा का आनंद है। इधर अहंकार की तो बातें भी नहीं, सब आत्मा की ही बात है, तो जो आनंद होता है न, वो ही सच्चा आनंद है। वो आनंद पूर्ण रूप से कब मिलता है कि जब चारित्र होता है। संसार में रहकर फिर चारित्र ग्रहण करता है, तब वो आनंद दिखता है। साध्य-प्राप्ति में ‘आवश्यक’ क्या?दादाश्री : कभी मोक्ष की इच्छा होती है या नहीं? प्रश्नकर्ता : हमारे जैसे साधारण आदमी को मोक्ष प्राप्ति कहाँ से होगी? हम तो कुछ धर्मध्यान हो जाए ऐसा करते हैं और आर्तध्यान न हो जाए ऐसा करते हैं। दादाश्री : आपकी बात बिल्कुल सच्ची है। आर्तध्यान-रौद्रध्यान बिल्कुल नहीं रहना चाहिए। कुछ न कुछ धर्मध्यान रहना चाहिए। लेकिन ‘ज्ञानी पुरुष’ मिल जाए तो मोक्ष की इच्छा करनी चाहिए। ‘ज्ञानी पुरुष’ मोक्ष दे सकते हैं। वो मोक्ष में ही रहते हैं। वैसे आम आदमी के जैसे ही दिखते हैं, लेकिन ये शरीर में वो रहते ही नहीं है, वो देह के पड़ोसी की तरह रहते हैं। वो मोक्ष दे सकते हैं। ‘ज्ञानी पुरुष’ नहीं मिले, तो कुछ न कुछ हेल्प लेनी चाहिए कि अपने को आर्तध्यान-रौद्रध्यान नहीं हो। इसको ही भगवान ने ‘धर्मध्यान’ बोला है। आपको इसके आगे कुछ ज़रूरत हो तो हम बता देंगे। प्रश्नकर्ता : आकुलता न हो और निराकुलता रहे, वो ही चाहिए। दादाश्री : बस, बस, निराकुलता वो ही लक्ष्य चाहिए। बराबर है, निराकुलता ही माँगना, जगत् सारा आकुल-व्याकुल है। (पृ.६२)जगत् के लोगों को निरंतर आकुलता-व्याकुलता होती है, शांति नहीं रहती। वो अशांति में नए कर्म पाप के बाँधते हैं और शांति हो तो फिर नए कर्म पुण्य के बाँधते हैं। लेकिन कर्म बाँधते ही हैं और ये महात्मा लोग हैं, उनको हमने ‘ज्ञान’ दिया है, ये लोग कर्म नहीं बाँधते। ये खाना-पीना सबकुछ करते हैं लेकिन कर्म नहीं बाँधते हैं। फिर आकुलता-व्याकुलता बिल्कुल नहीं होती है, निरंतर आनंद रहता है। क्योंकि छोड़ने के थे अहंकार-ममता, वो छोड़ दिए और ग्रहण करने का था निज स्वरूप, वो ग्रहण कर लिया। जानने का था वो सब जान लिया। हेय, उपादेय, ज्ञेय सब पूरे हो गए। नहीं तो लाख जन्म त्याग करे तो भी आत्मा मिले ऐसी चीज़ नहीं है और ‘ज्ञानी पुरुष’ की कृपा से एक घंटे में आत्मा मिल जाता है, क्योंकि ‘ज्ञानी पुरुष’ को मोक्षदाता बोला जाता है, मोक्ष का दान देने को आए हैं, दान लेने वाला चाहिए। हम जो बोलते हैं, उसकी कीमत आपको समझ में आ गई होती तो आप हमें छोड़ते ही नहीं। लेकिन आपको कीमत समझ में नहीं आई और समझ में नहीं आएगी। प्रश्नकर्ता : अभी तो संसार का चक्कर है। दादाश्री : नहीं, संसार का चक्कर तो सब को होता है। लेकिन मिथ्यात्व ज़्यादा बढ़ गया है। इससे सच्ची बात सुनने में आए तो भी समझ में नहीं आती। सच्ची बात, धर्म की बात, दृष्टि में ही नहीं आती। दूसरी ट्रिक की सब बात समझ जाएगा। जिधर ट्रिक कम है, वो धर्म की पूरी बात समझ जाता है। आपके पास सरलता है? कोमलता, मृदुता, मार्दवता (हृदय की कोमलता और सरसता) वो सब है? सरलता किसको बोली जाती है कि जैसा मोड़े ऐसा मुड़ जाता है। आप तो मशीन लाएँ तो भी नहीं मुड़ सकते हैं। फिर आप क्या करेंगे? प्रश्नकर्ता : हम में तो अभी मिथ्यात्व है न? दादाश्री : नहीं, मिथ्यात्व सब को होता है, लेकिन आपको तो मिथ्यात्व गुणस्थानक है। सब को तो मिथ्यात्व गुणस्थानक भी नहीं, अज्ञ गुणस्थानक है। क्योंकि आप तो जानते हैं कि मोक्ष है, मोक्ष का (पृ.६३)मार्ग है और वीतराग भगवान मोक्ष ले जाने वाले हैं। इतनी बात आपकी समझ में आ गई है और आपकी श्रद्घा में भी आ गई है, तो आपको मिथ्यात्व गुणस्थानक हो गया है। दूसरे लोगों को तो मोक्ष में कौन ले जाएगा, वो भी मालूम नहीं। अरे, मोक्ष को समझता ही नहीं। क्या पसंद? सीढ़ी या लिफ्ट?प्रश्नकर्ता : मोक्ष में जाने के लिए क्या करना चाहिए? दादाश्री : भगवान ने गीता में, रामायण में बताया है कि मोक्ष में जाने के लिए आत्मा प्राप्त करना चाहिए। लेकिन आत्मा पुस्तक में नहीं लिखा जा सकता। अवर्णनीय है, अव्यक्तव्य है। ‘ज्ञानी पुरुष’ के पास आत्मा है और वो मोक्ष के ‘लाइसेन्सदार’ हैं। मोक्ष प्राप्त करने के लिए दो मार्ग हैं। एक क्रमिक मार्ग है और दूसरा अक्रम मार्ग है। चौबीस तीर्थंकरों का जो साइन्स था, वो क्रमिक था। ऋषभदेव भगवान के पास क्रमिक और अक्रम, दोनों मार्ग का ज्ञान था। ऋषभदेव भगवान ने भरत चक्रवर्ती को राज चलाने को कहा था। तब भरत राजा बोलने लगे कि, ‘हमारे को भी मोक्ष में जाने का विचार है। हमें भी दीक्षा दे दो। हम को ये चक्रवर्ती का राज नहीं चाहिए।’ लेकिन भगवान ने कहा कि, ‘नहीं, आपको राज करना पड़ेगा, लड़ाई करनी पड़ेगी, आप निमित्त हो। तो आप राज करो, लड़ाई करो, लेकिन आपको ऐसा ज्ञान दूँगा कि ये सब करते-करते भी आपका मोक्ष एक क्षण भी नहीं जाएगा।’ वो ‘अक्रम विज्ञान’ दिया था। तेरह सौ रानियाँ थीं, चक्रवर्ती का राज था, लेकिन उनको एक भी कर्म नहीं लगता था। आपको कितनी रानियाँ हैं? प्रश्नकर्ता : एक ही है। दादाश्री : एक ही रानी है फिर भी उसके साथ झगड़ा होता है?! ऋषभदेव भगवान के वक्त में जो अक्रम मार्ग था, वो ही ये अक्रम मार्ग है, लेकिन अभी उदय में आया है और हम उसके निमित्त हैं। ये ‘अक्रम विज्ञान’ है। बड़ा सिद्घांत है। भगवान का ज्ञान है, वो ही ये (पृ.६४)ज्ञान है। प्रकाश तो वो ही है लेकिन मार्ग अलग है। भगवान का ‘क्रमिक मार्ग’ था, ये ‘अक्रम मार्ग’ है। क्रमिक मार्ग यानी स्टेप बाइ स्टेप चढऩे का। जितना परिग्रह कम कर दिया, उतने स्टेप ऊपर चढ़ गया और दस हज़ार स्टेप चढ़ गया तो फिर कोई पहचान वाला मिल गया कि चलो इधर कैन्टीन में, तो फिर तीन हज़ार स्टेप नीचे उतर जाता है। ऐसे मोक्ष में जाने के लिए स्टेप चढ़ते-उतरते, चढ़ते-उतरते आगे जाने का। लेकिन मोक्ष में जाने का पूरा रास्ता नहीं मिलता। ये तो लिफ्ट मार्ग निकला है। आपको कौन सा मार्ग पसंद है? सीढ़ी या लिफ्ट? प्रश्नकर्ता : लिफ्ट ही पसंद आए न? दादाश्री : ये लिफ्ट मार्ग है। इसमें तप-त्याग कुछ करना नहीं पड़ता। सिर्फ हमारी आज्ञा में ही रहना पड़ता है। ये आज्ञा संसार में किसी तरह अड़चन नहीं करती। एक या दो जन्म में मोक्ष हो जाता है। लेकिन पहला मोक्ष यहाँ ही, इस मनुष्य जन्म में ही होता है। मोक्ष, यानी सभी दु:खों का अभाव होना चाहिए। पहला मोक्ष ये है, फिर सब कर्म पूरे हो गए तो सिद्घगति में चला जाता है, वो दूसरा (अंतिम) मोक्ष है। ‘अक्रम मार्ग’ से एक घंटे में आपके सभी पाप भस्मीभूत हो जाते हैं, दिव्यचक्षु मिल जाते हैं और आत्मज्ञान भी मिल जाता है। मुक्ति सुख इधर से ही चालू हो जाता है। आप सर्विस भी कर सकते हैं, पत्नी के साथ घूम-फिर भी सकते हैं, सिनेमा में भी जा सकते हैं!!! संसार आपका ड्रामेटिक चलेगा। और ड्रामेटिक को द्वंद्वातीत बोला जाता है। क्रमिक मार्ग में सब का त्याग करना पड़ता है। परिग्रह कम करते-करते जाना पड़ता है। सब बाह्य परिग्रह खलास हो जाता है, फिर अंदर क्रोध-मान-माया-लोभ का एक भी परमाणु नहीं रहता है। अहंकार में भी एक परमाणु क्रोध-मान-माया-लोभ का नहीं रहता है और संपूर्ण शुद्घ अहंकार होता है, तब ‘शुद्घात्मा पद’ प्राप्त होता है। ‘अक्रम मार्ग’ में तो (ज्ञानी पुरुष की कृपा से) एक घंटे में ही (पृ.६५)आपके सब क्रोध-मान-माया-लोभ खलास हो जाते हैं और अहंकार संपूर्ण शुद्घ हो जाता है, तब ही आपको निरंतर ‘मैं शुद्घात्मा हूँ’ ऐसा लक्ष्य में बैठ जाता है!!! ‘अक्रम मार्ग’ दस लाख साल में एक दफे निकलता है। इसमें जिसको टिकट मिल गई, उसका काम हो गया। प्रश्नकर्ता : लेकिन जो आसानी से मिलता है, उसकी कीमत भी नहीं रहती है न? दादाश्री : लेकिन ये इतनी आसानी से भी मिलता नहीं है न? इसके लिए बहुत पुण्याई की ज़रूरत है। इसकी टिकट भी लिमिटेड है। ये ज्ञान पब्लिक के लिए नहीं है, प्राइवेट है। टिकट पूरा होने के बाद किसी को ये ज्ञान नहीं मिल सकता। क्योंकि ये टिकट उसकी पुण्याई से मिलती है। ये हरेक के लिए नहीं है। ये तो पुण्याई के बदले में मिलती है। ऐसे मुफ्त में नहीं मिलती। कोटि जन्म की पुण्याई हो, तब ‘ज्ञानी पुरुष’ के दर्शन होते हैं। प्रश्नकर्ता : यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमारे में क्या पात्रता होनी चाहिए? दादाश्री : हम को मिले वो ही आपकी पात्रता है। बाकी, इस कलियुग में कोई पात्र ही नहीं है। 33%' से पास होता है। यहाँ तो सब माइनस वाले ही आते हैं। इस काल में पात्रता कहाँ से लाए? आप मुझे मिले वो ही आपकी पात्रता है। नहीं तो आप कौन से आधार से मुझे मिले? कई लोग को तो मैं सीढ़ी में देखते ही कह देता हूँ कि ये यहाँ आ तो रहा है, लेकिन ये अंदर तक नहीं आ सकेगा। जिसकी पुण्याई हो, वो ही यहाँ आ सकेगा, दूसरा नहीं। शुक्लध्यान इस काल में (संभव) नहीं है। लेकिन ये ‘अक्रम मार्ग’ है, अपवाद मार्ग है, इसलिए यहाँ शुक्लध्यान होता है। ‘क्रमिक मार्ग’ से इस काल में शुक्लध्यान नहीं होता। ‘क्रमिक मार्ग’ में अभी धर्मध्यान तक जा सकता है। कई लोग हम को पूछने लगे कि, ‘आपने ‘अक्रम मार्ग’ क्यों निकाला?’ तो हमने बोल दिया कि ‘क्रमिक मार्ग’ (पृ.६६)का बेसमेन्ट सड़ गया है, इसलिए कुदरत ने ही ये अक्रम मार्ग ओपन किया है। ये मैंने नहीं निकाला। क्रमिक मार्ग का बेसमेन्ट सड़ गया है, यानी क्या? मन-वचन-काया का एकात्म योग जब तक है, तब तक क्रमिक मार्ग चल सकता है। मन-वचन-काया का एकात्म योग, यानी मन में जो है, वैसा ही वाणी से बोलता है और वैसा ही वर्तन करता है। ऐसा इस काल में है? प्रश्नकर्ता : किसी का भी नहीं। दादाश्री : इसलिए क्रमिक मार्ग आज नहीं चल सकता, तो कुदरत ने ये अक्रम मार्ग खोल दिया है। हम उसके निमित्त बन गए हैं। ये अक्रम विज्ञान है, वो सब सफोकेशन को फ्रेकचर कर देता है। ये विज्ञान संपूर्ण विज्ञान है और प्रकट विज्ञान है। ये विज्ञान से ही भ्रांति टूट जाती है। सारी दुनिया को अनुकूल आए, ऐसा ये विज्ञान है, बिल्कुल, समग्र, पूरा अविरोधाभासी है और सैद्धांतिक है। समग्र सिद्घांत है इसमें, और स्याद्वाद भी है, अनेकांत है, किसी प्रकार का इसमें आग्रह नहीं है। प्रश्नकर्ता : स्याद् को कोई वाद नहीं होना चाहिए। दादाश्री : हाँ, स्याद् में कोई वाद नहीं चाहिए, नहीं तो एकांतिक हो जाएगा। ये तो अक्रम विज्ञान है, बिल्कुल स्याद्वाद है। सब लोगों को, पारसी को, मुस्लिम को, सब को अनुकूल आता है। एकांतिक का अर्थ ही संसार और स्याद्वाद, अनेकांत उसका नाम ही मोक्षमार्ग। मोक्ष में जाने के लिए दो रास्ते ही अलग हैं। मोक्ष के लिए त्याग करने की ज़रूरत नहीं है। त्याग तो हरेक आदमी से नहीं हो सकता है। वो तो किसी आदमी से ही त्याग हो सकता है। तो जिससे त्याग नहीं हो सकता, उसके लिए तो मोक्ष का दूसरा रास्ता तो है न? भगवान ने सब रास्ते रखे हैं। क्रमिक मार्ग में सब त्याग करते-करते मोक्ष में जाने का। यह अक्रम मार्ग है, इधर कुछ भी त्याग करने का नहीं है। - जय सच्चिदानंद |